मुल्य
By Vishvadeep Jain
कहां से कहां आ गए है,
हम बचपन से जवानी मैं आ गए हैं,
मूल्य की बात तो करूंगा,
पर ना जाने क्यू इतना शीघ्र यहां आ गए,
बचपन में जो घर का आंगन प्यारा लगता था ,
वो छोड़कर हम कमाने घर से दूर आ गए,
अपने सुकून का मूल्य चुकाकर हम दो पैसे कमाने घर से दूर आ गए,
जिस मैदान में हमारी आवाज गूंजा करती थी ,
उस मैदान को सुनसान कर हम आगे निकल आए,
खेल की प्रतिभा का मूल्य चुकाकर हम 9 से 5 की नौकरी करने आ गए,
अपनो की खुशियों की बड़ी परवाह है हमें ,
हम वही कमाने घर से दूर आ गए ,
घरवालों के साथ का मूल्य चुकाकर हम अनजानों के बीच आ गए,
अपनो के मुख पर हंसी लाने निकले थे ,
अब वो हसीन चेहरे देखने को तरस जाते है,
वर्ष में 365 दिन का मूल्य चुकाकर 30 दिन की खुशियों
के पीछे भाग आए,
अब घर जाओ तो अच्छा लगता है ,
पर कुछ तो छुटा छुटा सा लगता है,
अब घर अपनाता नहीं और वो आंगन अब अब पराया सा लगता है,
क्यूंकि पहुंचने के पश्चात कब निकलना है वाली बात अब हर बार जोर पकड़ती है,
दोस्तो को कही दूर छोड़ आए है ,
अब महीनों बात नहीं होती,
काम में व्यस्त हु कहकर कभी बात टाली भी जाती है,
बस उस दोस्ती का मूल्य चुकाकर बाहर अकेले रहने आ गए ,
इस बचपन से जवानी तक आने मैं कई मूल्य चुकाकर हम यू ही आगे बढ़ आए ,
हम मूल्यों को चुकाते चुकाते कही दूर स्वयं से ही कोसो दूर आ गए है ।।
By Vishvadeep Jain

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