मुलाक़ात
By Syed Aamir Razaa
चंद रोज़ हुए थे, नया माहौल जैसे शाम की तरह उसके आंखों में ढल रहा था। वो हर रोज निकल कर गस्त लगाते नए जगह को किसी माशुका की तरह निहारता। उसने हर कतरा जो इस जगह की खुमार में था, उसमें सराबोर हो चुका था। बीते कई दिनों में मानों वो इस जगह का एक हिस्सा हो चुका था। जगह कुछ खास नहीं थी, कच्ची सड़कें, बनते हुए मकान, आस पास खेत पानी में डूबे हुए। और चारों ओर विरानियों से घिरा उसका मकान। अगर कोई मकान होता भी तो उसे क्या मालूम चलता। वो अपनी ही दुनिया में गस्त लगाता। हवा से बिखरते बालों से खेतों को मचलते देखता, तो कभी खुस्क पड़े आरिज़ों से बादलों को। रोज़ का उसका यही मामून था, जब तक वो न मिली जो इस शांत से समंदर में सैलाब लाने वाली थी।
एक रोज़ वो यूं हीं गस्त लगाने निकला था और अपने ख्यालों में मदहोश था के तभी मानों झोंके से उसे नींद से उठाती एक आवाज आई।
ओ, हेलो!!
वो इस अंजान जगह में किसी से मुखातिब ना हुआ था, तो वह रुक कर चलने लगा। जैसे उसने कदम बढ़ाया ही था, की उसके कंधे पर एक हाथ आ ठहरा। उसने पिछे मुडकर झल्लाहट में देखा, पर जब नज़र पड़ी तो मानो जम सा गया। भूरी आंखें दरिया के किनारों की तरह, सारा दरिया समेटे हुए उसकी पलकें। तीर के अगले हिस्से जैसी नुकिली नाक। ओस गिरे पंखुड़ियों से होंठ। अपनी उंगलियों से अपनी केसुएं सुलझाते। सफेद कुर्ते में दुसरे हाथ से दुपट्टे को दिखाते। उसने कभी इतनी बारिकी से किसी शाम को भी नही निहारा होगा। उसके खामोश लबों पर मुस्कान आ ठहरी थी।अभी डुबकी ही लगाई थी इस नए अहसास में की झंझोर कर उसे निकाला उसने।
तुम्हें दिखाई नहीं देता, या सुनाई नहीं देता। (उसने गुस्से में कहा।
कब से आवाज़ दे रही हूं, तुम अपनी दुनिया में खोए हुए हो।
"माफ़ करिएगा, मैंने आपको सुना नहीं।"
"सुना ही नहीं बल्कि देखा भी नहीं।"
इतना कहते वो हाथ उसका उठाती है और उसके कलाई पर बंधे घड़ी में अपने दुपट्टे का फंसा सिरा दिखाती है। उसने जल्द से सम्भाल कर दुपट्टे को अलग किया।
जी! आप इसी मोहल्ले में रहती हैं?
उसने पलकें उठा कर देखा और फिर दुपट्टे को सम्हालने लगी।
उसने घड़ी को उतार कर अपने जेब में रखा। ओर इक टक उसे देखने लगा, किसी मौसम में भी उसने ऐसी रंगत नहीं देखी थी। वो अपने रास्ते में आगे बढ़ गई। और ये फिर से ख्याल में मशगूल हो गया लेकिन इस बार अपने नहीं उसके। उसको ये इत्तेफाक नहीं एक इशारा लगने लगा। आखिर कितनी ही बार उसने घड़ी उठा कर उसे देखा ये तो उसे खुद भी याद नहीं होगा। रोज़ अब वो निकलता तो जरूर लेकिन अब गस्त लगाने नहीं। इक मुलाकात की आस में।
हर रोज़ वही वक्त देख कर निकलता चारों ओर नजरें फेरता और फिर अगले दिन यही करता।इसी हाल में महीनों गुज़र गए पर वो मुलाकात फिर ना मुकम्मल हुई। कभी वो खुद को कोसता कभी ख़ुदा को। शांत समंदर में हलचल हो चुकी थी और इस नए अहसास से काफी बेचैन हो गया था। हर जुमरात को वो दरगाह जाने लगा इसी आस में कहीं तो उसे वो सुकून मिले और अगर न मिले तो वो तो मिले।
“कभी कोई मुलाकात कितनी हसीन होती है,
ये दुनिया जो बेशक हमें मशरुफ रखती है,
अपने उतार चढ़ाव के दो मायनों में,
हम ठहरना भुला देते हैं, और जब हम कभी ठहरते हैं,
तो किसी से मिलने ही ठहरते हैं,
वो मुलाकातें ही हमें जीने का पहलु बताती हैं,
और कुछ ऐसी होती हैं जो जीना ही भूला देती हैं।“
जैसे वक्त गुजरता चला गया, उसकी उम्मीदें फिकी पड़ने लगी। लेकिन खरोंच तो लग चुकी थी, और उसे कितना भी रफू करा लो नज़र तो उसे धुंध ही लेगी। वो वक्त बे वक्त उस खरोंच को टटोलता और फिर बुझी पड़ी आग में फूंक मार, उम्मीदों की चिंगारी जलाता। पर ये लपटें उसके ही सुकून का आंगन जला रही थी। वो भुलने और टटोलने के दौरान फंसता चला जा रहा था। एक मुलाकात, एक झलक सैलाब कैसे ला सकती है? जिस एहसास पर वो कभी दीदें भी नहीं फेरता था वो उसके अंदर घर कर चुकी थी। बेचैन, बेबस सारी कोशिशें बेकार। उसे अपने इस हाल से बू आने लगी, एक दिन उसने ये चढ़े मुश्क को झाड़ने का फैसला लिया। उसने दरगाह का नियत किया और चल पड़ा इस बार उसे मुक्कमल तौर पर भुलाने।
दरगाह शरीफ में उर्स को लेकर काफी भीड़ थी। पैर रखने को भी जगह नहीं थी, मानो पुरा शहर अपनी मुरादें पूरी करने आया हो। इस बीच भीड़ का हिस्सा वो भी था। किसी तरह जगह बनाते वो अंदर पहुंचा। उसने फातिहा पढ़ कर दुआ में हाथ उठाया और अपने सुकून के लिए दुआ मांगी। दुआ मांग कर जैसे ही उसने हाथ फेरा था, उसकी सुकून सामने दुआ मा़ग रही थी। उसकी धड़कनें बेचैन होने लगी, उसकी आंखें वहीं उसके चहरे पर ठहर गई। उसने दुआ खत्म कर अपनी पलकें खोली और दोनों की आंखें मिलीं। मानो जैसे रेगिस्तान में बारिश हुई हो, किसी प्यासे को समंदर मिला हो, डुबे को कश्ती दिखाई दी हो, सुखी टहनियों पर एक नन्ही चिड़िया कुहूक रही हो, सर्द मौसम में धुप निकल आई हो, किसी मजदूर को उसे दिन भर की कमाई मिली हो।
वो मन में उसकी तरफ दौड़ कर उसके करीब जाना चाह रहा था, उसे मिलकर सारा हाल बयान करना चाह रहा था। खुदा को वो लाख शुक्रिया अदा कर रहा था। उतनी भीड़ में मानो दोनों अकेले हों। एक दुसरे को तकते रहे। वो उसकी तरफ बढ़ने लगा पर ज़माने को ये मिलना मंज़ूर नहीं था। भीड़ में वो उससे दूर होता चला गया। वो दरगाह के बाहर आकर उसका इंतज़ार करने लगा। वो कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। वो मायूस होकर वहीं किनारे बैठ गया। इतने में वो उसे अपने बगल पाता है। वो अपना सफ़ेद दुपट्टा दिखाती है जो उसकी घड़ी में फंस गया था, फसने पर जो खरोंच आई थी उसे उसने ऐसे ही बिना रफू कराए छोड़ रखा था।
उसने कहा, "ये देखो, तुम्हारा दिया हुआ तोहफा।"
"आज तुमने घड़ी नहीं पहना?" उसने पुछा।
उसकी जान उसके हलक में आ गई थी। इतना कुछ था उसके मन में पर ज़ुबान इनकार कर रही थी।
"अरे तुम बोल क्यों नहीं रहे? नाराज़ हो?"
"मैंने तुम्हें ज्यादा सुना दिया था क्या?"
"नहीं ऐसा कुछ भी नहीं, हम तो भुल भी गए।"
"अच्छा इसलिए रोज़ उसी वक्त मेरा इंतज़ार करते हो।" उसने हंसते हुए कहा
वो हैरान था। उसे समझ नहीं आ रहा था ये क्या हुआ। उसे कैसे मालूम हुआ। आखिर जब उसे मालूम था तो वो मिलने क्यों नहीं आई। वो इस सोच से बाहर निकल कर उससे ये सारी बातें बोलने वाला था। कि उसने कहा, "हाथ बढ़ाओ अपना!" वो रुका। उसने फिर कहा, "अरे बढ़ाओ भी।" उसने अपना हाथ बढ़ाया। वो अपने बंद मुठ्ठी से काला धागा निकाल कर उसके हाथ पर बांधने लगी। ये मेरी तरफ से। इतना बोल कर वो वहां से उठ कर चली गई। उसे कुछ समझ आए उससे पहले ही वो आंखों से ओझल हो चुकी थी। वो एक टक अपने हाथ में बंधे धागे को देखने लगा। वो खुश था और हैरान भी।
वो अपनी खुशी में अपनी बाईक पर सवार होकर जाने लगा। उसका चहरा उसके ज़हन में समा गया था। उसके ख्यालों में खोया वो अलग ही मिज़ाज में था। इतने दिनों से जिस सुकून की वो तालाश में था वो आज उससे ना ही सिर्फ मिली उससे बातें भी की। वो अपने धागे को देखा और उसे चुमा। रास्ते की उसे कोई खबर नहीं थी। खुयालों में वो खोया जा रहा था। कि रास्ते की जाम ने उसे ख्याल से बाहर निकाला। उसने कोसते हुए कहा, "ये पटना की जाम!" वो इधर उधर देखने लगा बगल वाली लेन खाली थी। वो आगे बढ़ कर टेमपू वाले से पूछा यह जाम किस लिए इस वक्त तो यह रास्ता खाली रहता है।
"अरे भाई! पता नहीं दो घंटा से जाम है टस से मस नहीं हो रहा आप दुसरे रास्ते से चल जाएं।"
वो बाईक मोड़ने लगता है, फिर उसके मन में ख्याल आता है। जाम छुड़वा देते हैं, आखिर आई-एस बनने के बाद समाज के लिए ही तो काम करना है। यह सोच कर अपनी बाईक को किनारे लगा कर आगे बढ़ता है। जैसे आगे बढ़ता है जाम भी बढ़ता जाता है। जाम ख़त्म होता है तो देखता है बहुत से लोग भीड़ लगाए खड़े हैं। वो जाता है और भीड़ खाली करने लगता है उतने में उसे स्कूटी के कुछ बिखरे पूर्जे दिखाई पड़ते हैं। और आगे बढ़ता है तो उसके दिल में हलचल होने लगती है। सफेद दुपट्टा उसे दिखाई पड़ता है जो अब लाल था। वो भीड़ को चिरते आगे बढ़ता है। उसकी नज़र उसपर पड़ती है। वही खुली जुल्फें, वही मासुमियत से भरा चेहरा जो अब बेजान था। जो उसके लिए हलचल लाई थी, वो अब लाश थी।
मानो उसके पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई हो। वो लड़खड़ाते हुए गिर पड़ा, उसकी आंखें बहने लगी। अभी कुछ देर पहले ही तो मेरे सामने थी, मुस्करा रही थी, मुझसे बातें कर रही थी। फिर वो कौन थी? मुझे याद है, मैं ग़लत नहीं हो सकता। ये सच नहीं है। ये ख्वाब है। वो लोगों की ओर देखता है जो बूत बने उसे देख रहे थे। वो मदद को गुहार लगाता है, चिखता है, चिल्लाता है। पर उसके हलक से एक आवाज नहीं निकली, मानो किसी ने उसका गला जाम कर दिया हो। वो पुरी ताकत लगा कर कोशिश करता है पर वो नाकाम होकर, वहीं थक कर उसके पास बैठ जाता है।
लोग उसे सम्हालते हैं। बेटा! दो घंटे हो गए। हमने एम्बुलेंस बुलाया है। रास्ते में है। अब हम कुछ नहीं कर सकते।
"नहीं यह सच नहीं है। मैं अभी उसे जगाता हूं।" वो गुस्से में बोलता है।
वो आगे जा कर उसे जगाने की कोशिश करने लगा जो अब हमेशा के लिए सो चुकी थी। उसने हाथ में उसे उठाया और उसके सर को जैसे अपने गोद में रखा उसका हाथ खून से लथपथ हो गया। वो अपने हाथों को देख कर सहम जाता है और उस रंग को मिटाने लगता है जो उसके हर रंग को बेरंग कर चुकी थी।पर जितना ही वो रंग को पोंछने की कोशिश करता है वो और फैलता जाता है।
उसने चारों ओर गुहार लगाई पर लोग देख ही रहे थे मानो सारा ज़माना उसके ज़िन्दगी के ज़नाजे पर तमाशा देखने आया हो। वो चिल्लाया, चिखा पर अब बहुत देर हो चुकी थी। उसका जिस्म बर्फ सा ठंडा पड़ गया था। थोड़ी देर बाद एम्बुलेंस आई और उसे ले जाने लगी। वो उससे दूर जा रही थी, फिर से। वो उसकी आंखों के सामने से ओझल हो रही थी, फिर से। वो उसे रोक नहीं पाया, फिर से।
लोग उसे उठाते हैं। वो किसी तरह अपने घर पहुंचता है। उसके हाथों में अभी भी उसका खून लगा था। वो रोते हूए हांथ ढोने लगता है। उसकी नज़र उस काले धागे पर पड़ती है। आखिर क्यों? क्यों किया तुमने ऐसा। जब जाना ही था तो मेरे सामने ही क्यों आई।वो गुस्से में कैंची निकाल धागे को काट देता है। और दरवाज़े के बाहर उसे फेंकने जाता है। की उसके कंधे पर फिर वो हाथ आता है।
"तुम मेरा दिया तोहफा फेंक दोगे।" एक जानी पहचानी आवाज़ आती है
वो रोने लगता है और धागे को अपने जेब में रख कर वहीं बैठ जाता है। वो रब की तरफ हाथ उठाता है और रोते हुए कहता है।
“एक मुलाकात हुई तुमसे इस जहां में,
हिज़्र में गुजरेगी ये जान अब इस जहां में,
पुरी होगी ये मुलाकात उस जहां में,
जो अधुरी रह गई तुम्हारे साथ इस जहां में। “
By Syed Aamir Razaa

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