मुलाक़ात
By Akanksha Mishra
है चाहत के आज फिर मुलाक़ात हो,
हो लफ़्ज़ों की महफ़िल,
या के ख़ामोशी की बात हो,
है चाहत की आज फिर मुलाक़ात हो,
हो इत्र से मौज़ूद,
तुम मेरे वजू़द में,
जिस से महक उठती है हर सुबह,
और ढल जाती है हर शाम
फिर तेरे इंतज़ार में,
होते हो रु-ब-रु ऐसे,
जैसे सांझ का सूरज,
दौज के पल भर को आये चाँद को तकता हो,
है चाहत की आज,
तेरे दीदार के पल बेशुमार हों।
उठ-ते हो बादलों से,
तुम दिल के आसमान में,
बहते हो सबा से,
हर आती जाती सांस में,
डूब सी जाती हूं फिर,
तुम्हारे ही एहसास में,
है ख़्वाहिश के आज फिर,
दिल का आंगन गुलज़ार हो।
हो लफ़्ज़ों की महफ़िल,
या के ख़ामोशी की बात हो,
है चाहत के आज फिर मुलाक़ात हो।
By Akanksha Mishra

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