मुद्दतों के बाद
By Aseem Ahmed Abbasee
बड़ी मुद्दत हमारे बिन रही हो,
कहो कैसी हो? अच्छी हो? सही हो?
ज़रा मुश्किल हुई पहचानने में,
मगर दिल चाहता था ये वही हो,
जो मिलने से भी कतराते हैं बोले,
बड़े दिन हो गए मिलते नहीं हो,
हर इक मुद्दे पे उनसे बात की पर,
क़सम ले लो जो मुद्दे की कही हो,
भरी महफ़िल में उसकी बात कर दूँ,
मगर सोचा न वो बैठा यहीँ हो,
हमारी आँख में आँसू नहीं ये,
तुम्हें रहतीं थीं सो तुम ही बही हो,
अगर अगला जनम हो तुम न मिलना,
पता क्या फिर मेरा क़िस्सा यही हो.
By Aseem Ahmed Abbasee

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