मुझे डर लगता है
By Garima Joshi
मुझे डर लगता है
रात में बाहर निकलने से
अकेले कमरे में सन्नाटे से
इत्र लगाकर पार्टी में जाने से
रात को बेझिझक सड़कों पर नाचने से।
मन करता है मेरा भी
जाऊँ दूर कहीं पहाड़ियों पर
जाऊँ कहीं जहाँ कोई न ढूँढ़ने आए
जहाँ रेगिस्तान पहाड़ से मिल जाए।
समुद्र की गहराइयाँ मुझे अक्सर पुकारा करती हैं
अपने नमकीन पानी में मिठास ढूँढ़ने को कहती हैं
पर मैं क्या करूँ?
सोचती हूँ ये सारी बंदिशें तोड़ दूँ
भाग जाऊँ दूर किसी कोने में
उन वादियों के बीच जो मुझे पुकारती है
जिसकी हवा के सुकून में मेरी रूह इठलाती है।
तय कर ही लिया था ये बेड़ियाँ तोड़ दूँगी मैं
अपने पंख फिर से फड़फड़ा लूँगी मैं
बस तैयार ही थी अपनी उड़ान भरने के लिए फिर
कहीं किसी कोने से एक आवाज़ आई!
"घर में आठ बजे से पहले आ जाना,
माहौल खराब है, कहीं दूर मत जाना।"
डर के ही सही, एक दिन निकल ही पड़ी मैं
पहाड़ों में सुकून तलाशने
समंदर के खारे पानी में मिठास ढूँढ़ने
कुछ अजीब सा महसूस हुआ मुझे उस दिन
मानो आँखें खुली हों फिर भी नींद आ रही हो
लफ़्ज़ तो बहुत हों, पर होंठ अब भी मिठास में घुल रहे हों
एक पल में मानो सारा डर छूमंतर हो गया।
फिर लगा — ये शायद मेरा डर नहीं, एक झिझक थी
मेरे मस्तिष्क के अफ़साने नहीं
समाज के छलावे थे
ये सोच के अब सच में भय होता है मुझे
दुनिया के इस बहलावे से।
By Garima Joshi

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