मुखौटे
By Parul Bhargava
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं
मीठी बातों से अपनापन जताकर
जहाँ में धोखे बहुत ही होने लगे हैं॥
सच्चाई से कोसों दूर सिर्फ दिखावा
करते देखा है लोगों को अक्सर
सम्बन्धों की गरिमा नाप-तोल कर
रिश्ते आज परिभाषित होने लगे हैं ।
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं ॥
कहने-सुनने का वक़्त कहाँ किसी को
रूठने-मनाने का तो ज़िक्र भी ना कर
भूल गये साथ बैठना मिल-जुलकर
अकेलापन ही संगी-साथी होने लगे हैं ।
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं ॥
जीवन की आपाधापी में हैं लिप्त सभी
वजूद अपना तराश रहे सुकून खोकर
काम तो करते हैं बहुत सोच समझकर
किन विचारों में ये परिपक्व होने लगे हैं ।
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं ॥
फ़ुर्सत के लम्हें ढ़ूँढ़े से मिलते कहाँ अब
नहीं ठहरी कभी समय की भी यहाँ रफ़्तार
नासमझ बन बैठा है इंसान जानबूझकर
अपनी ख़ुशियों पर भी पहरे होने लगे हैं ।
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं ॥
ख़ुशनुमा जिन्दगी जीते दिखते हैं सभी
अपने कृत्रिम ताने-बाने में लिपटकर
दोहरी दुनिया की माया में उलझकर
भाव अंतर्मन के कहीं लुप्त होने लगे हैं ।
प्रत्येक चेहरे आज मुखौटे पहनकर
हकीकत छोड़ आभासी होने लगे हैं ॥
By Parul Bhargava

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