मीठा ज़हर
Updated: Feb 2, 2024
By Banarasi
मैं तुम्हें दे सकूं
ऐसा कहां कुछ मेरे पास है
जिंदगी के भंवर में
उलझे मेरे हालत है
तुम मांगोगे वक्त मेरा
मेरा वक्त नहीं मेरे साथ है
मत करो उम्मीद मुझसे तुम
मेरे खुद से बिगड़े जज्बात है
उम्मीदों के शिखर से
ढहते कुछ ख्यालात है।
ये मत समझना मैं तुम्हे ठुकरा रहा
पर जिदंगी से मेरे
कुछ अपने सवालात है
ना चीखे है ना दर्द है
बस कुछ पाने का लगा ये मर्ज है।
दिया ये जीवन जिसने मुझे
उसके प्रति मेरा कुछ फर्ज़ है
इस जीवन पे उनका
यही मेरे पे इक कर्ज़ है
यदि समझो ख़ुदगर्ज मुझे
इसमें ना कोई हर्ज है।
मेरा एक पल सहर तो
तो दूजा ढलता उजला पहर है।
चीखती रातें गुमसुम दिन
ख़ामोशी से उठती यही लहर है।
मैं नही चाहता कोई जुड़े मुझसे
क्योंकि बनारसी की जिंदगी मीठा ज़हर है।
By Banarasi

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