माफ़ी माँ
By Poonam Chakraborty
सब जानते-बुझते भी
हर पल तुमसे उलझने की
माफ़ी चाहती हूँ माँ।
तुम्हारे सपनों के आड़े
ज़िम्मेदारी बनकर आने की
माफ़ी चाहती हूँ माँ।
अक्सर सोचती हूँ,
एक माँ का स्नेह तुम्हें भी मिलता
तो कैसा होता।
चुनने की आज़ादी,
सपने देखने की हिम्मत,
हर दिन तुम्हारा खुशियों से भरा होता,
हर रात आराम में लिपटी होती।
तुम खिलतीं, तुम मुस्कुरातीं,
तुम सुरक्षित महसूस कर पातीं
और ज़िन्दगी तुम्हारे चारों ओर
इंद्रधनुष से रंग बिखेरती।
अक्सर सोचती हूँ,
तुम माँ न होती तो कौन होती।
अक्सर पलटती हूँ पन्ने,
तुम्हारी ही कहानी दोहराते
लिखती हूँ —
तुम माँ न होती तो कैसी होती माँ।
एक डॉक्टर होतीं, क्या माँ?
या एक टीचर?
तुम सिंगर भी खूब होतीं माँ।
नहीं, तुम शायद अफ़सर होतीं माँ,
सही और ग़लत की परख में,
दुनिया का भला करने में
फिर से खुद को झोंक देतीं माँ।
तुम माँ न होती तो क्या कमाल होती माँ।
तुम्हारी अपनी एक दुनिया होती माँ।
तुम सबकी तरह अपने लिए जीतीं,
और किसी रोज़
एक भले इंसान के प्रेम में पड़तीं
और कितना प्रेम पातीं माँ।
सपने तुम अपने फिर भी पूरे सब करतीं,
शादी के बाद भी, आगे बढ़तीं,
तुम और बढ़तीं माँ,
सदा सुहागन रहतीं माँ।
एक नन्हा शहज़ादा होता,
नानाजी का अक्स होता
और तुम्हारे दिल पे राज करता।
कभी सुनकर उसकी सिसकियाँ
तुम्हारा भी दिल पसीज जाता।
ये सब जो हो पाता,
तुम थोड़ी कम कड़वी होतीं माँ।
ये सब जो हो पाता,
तुम कितनी खुश होतीं माँ।
तुम शायद खुल के जी पातीं माँ।
ये सब जो हो पाता,
मैं यहाँ कहाँ होती माँ।
कहते हैं, बच्चे की रूह
अपने माता-पिता खुद चुनते हैं।
तो सच ये भी है कि चयन कोई भी हो,
मैं बस तुम्हें चुनती माँ।
सब जानते-बुझते भी
तुमसे उलझने की
माफ़ी चाहती हूँ माँ।
By Poonam Chakraborty

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