माशूक
By Dr. Imran A.K. Surti
वो समजते हैं अगर इश्के-कलंदर खुद को,
ख़ाक सेहराओं की हमने भी उदा रख्खी है!
तेरी आँखों की कशिश कैसे बताऊँ तुजको,
तेरी पलकों पे सनम आबे-हयात रख्खी है!
क्यूँ न आ जाये बहलने का हुनर तबियत को,
तूने रुखसार पे हँसी जो सजा रख्खी है!
कतरा-कतरा ही सही प्यास बहुत ज़रूरी है,
लम्हा-लम्हा ही सही याद बहुत ज़रूरी है!
By Dr. Imran A.K. Surti

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