माँ हर कहीं दिख जाती है।
Updated: Aug 6, 2025
By Mukta Sharma Tripathi
दुश्मन राह रोकने को, हिम समान जम जाती है।
स्वयं गर्भ नग खोजती, आप खनिक बन जाती है।
माँ, मैया, महतारी या ईश्वर का तुम रूप कहो,
आप उज्ज्वल शक्ति पुंज मात प्रकृति कहलाती है।
थकती न परिश्रम से कभी, सरिता* सी बल खाती है।
कभी कठिन* चाँदी सी तो, पारे में, ढल जाती है।
अजी! सखी-बंधु रूप की, अभी और क्या बात करें!
एकाकी* माँ के रूप में, शक्ति मात बन जाती है।
कभी मीठी मिठाई तो, चटनी हमें चखाती है।
इच्छित फल देने वाली, कपिला* ये बन जाती है।
मृदु-मृदु दादी-नानी की, अभी और क्या बात करें?
इक धात्री, दूजी पैतृक* गृह रानी कहलाती है।
ऐतिहासिक संस्कृति से, ये हमको मिलवाती है।
माता-पिता की डांट के, आतंक से बचाती है।
आत्मविश्वस्त कर हमको, स्वप्न पथ देने वाली,
प्यारी सी सूरत वाली,बुआ लाड़ लड़ाती है।
अजी! ननिहाल आँगन में, शरबत सी घुल जाती है।
आम की ऊँची डाल पर, झूला हमें झुलाती है।
अनुपम ममता रस बरसा, मौसी कहलाने वाली,
अन्तर्मन में मीठी-सी, गोली ये घुल जाती है।
अध्यापिका रूप में ये, हृदय थाह पा जाती है।
बड़ी बहना के रूप में, दुनिया से लड़ जाती है।
अरे! दिव्य स्त्री रूप के, तुमको दर्शन करने हैं,
हृदय संस्कारित तो माँ, हर कहीं दिख जाती है।
By Mukta Sharma Tripathi

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