माँ व पुत्र कि विरह संवाद
Updated: Jul 30, 2025
By Prashant Rathi
माँ: आँखें कहती है, होठों पे जो नहीं हैं, थोड़ी देर और ठहर जा
पुत्र: पैरों चलना ना चांहे, धरती फिसलती जाये, कैसे रोकुँ खुदको बता
माँ: ये दायरे, हाय रे, क्यूँ बांधे है ये बता
ऐसी क्या बेबसी है, देख तनहा खड़ी तेरी माँ
पुत्र: फ़र्ज़ मेरा पुकारे है, जाना होगा माँ,
यादों के संग हि तुझको जीना होगा माँ
माँ: विरहा! दिल ये गाये, चुनर भी लहराये, आँचल सुना सुना है
पुत्र: एक टुकड़ा इस चुनरका, रख लूँ अपने संग मैं, मानूंगा के तूँ पास है
माँ: जानूं नहीं, कब-तक यूहीं, रहना है हमको अलग
जल्दी से लौट के आना, पल-पल देखती हूँ फलक
पुत्र: जा रहा हूँ तेरे लिये मैं घर बनाऊंगा इक शहर में
पर मैं तो लौटके सोऊंगा तेरे आँचल के छांव में
माँ: आँखें कह रही है, होठों पे जो नहीं है, जाओ मेरा आशीष है तुम्हें
पुत्र: पैरों दौड़ रहे हैं, धरती सज रही है, तेरा आशीष पाकर जो चलें!
By Prashant Rathi

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