माँ कालरात्रि
Updated: Jul 30, 2025
By Ketan Phadke
इस साल के नवरात्रि तक ये त्योहार के बारे में मुझे बिलकुल जानकारी नही थी. ईसी साल मैंने मेरा नया नवेला कविताओं का इंस्टाग्राम पेज बनाया था और कही श्रोता मुझे बोले आप देवियों पे कविता कीजिए…
हालाँकि बचपन से ही मुझे चुनौती लेने में बड़ा मज़ा आता है, पर ये चुनौती कुछ ख़ास थी. आँखिर में जब भगवान पे बात करनी है तब सब सही होना चाहिए, पर मैंने सोचा जब चुनौती बड़ी हो तभी तो उसका मज़ा आएगा …
फिर मैंने बहुत सारे लोगों से देवी के रूपों के बारे में बात की, थोडीसी गूगल पे खोज की और देवी कालरात्रि से में सबसे जादा प्रभावित हुआ.
तो देवी कालरात्रि ऐसी देवी थी जिसके कारन आज यें सृष्टि जीवित है और इसपे धर्म का राज है, तो कहानी कुछ इस प्रकार है…
शुंभ और निशुंभ नाम के दो महा भयंकर राक्षस थे. उनके अलावा उनका एक सहायक था, रक्तबीज..
इन राक्षसों ने ब्रह्मा जी की उपासना की थी. और उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें कुछ वरदान दिए थे…
शुंभ और निशुंभ का वरदान ये था की उन्हें कोई मानव (पुरुष) या कोई पशु मार नही सकता था… उन्होंने महिलाओं को उतना ताकदवर नही समझा… शायद वही गलती कर बैठे..
रक्तबीज का ये वरदान था की अगर उसके रक्त की कोई भी बूँद धरती पे गिरती तो उसमें से एक और रक्तबीज पैदा हो जाता…
अब ईन सब राक्षसों ने देवों पे आक्रमण कर दिया, इनके वरदानों की शक्ती के सामने देवताओं की सेना ने माथा टेक दिया. इंद्र देव ब्रह्मा जी की पास पोहचे और कुछ हल माँगा. ब्रह्माजी बोले अब बस देवी पार्वती ही हमें ईस संकट से बचा सकती है.
इसके बाद सारी देवतायें माँ पार्वती के क्षरण में आयीं, माँ पार्वती को राक्षसों के हिंसा की कहानियां सुनायी. माँ तो आकीर माँ होती है; माँ पार्वती ने अपने स्वर्ण त्वचा का त्वरित त्याग किया और माँ चण्डी का रूप धारण किया.
माँ चण्डी फिर शुंभ और निशुंभ का नाश करने निकल पड़ी, घमासान यूध्य के बाद माँ चण्डी ने ईन दोनो राक्षसों का सर्वनाश कर दिया. मात्र रक्तबीज को मारना माँ चण्डी को भी संभव नही हो पाया, ईस बात से माँ बहुत क्रोधित हुईं.
उनके क्रोध के कारन माँ कालरात्रि ने उनके मस्तक से जन्म लिया, यें माँ दिखने में इतनी डरावनी की थी इन्हें देख कर की राक्षसों की सेना भागने लगी.
रक्तबीज को किसी हत्यार से मारना संभव नही था क्योंकी अगर उसके एक खून की बूँद भी धरती पे गिर जाए तो एक और रक्तबीज पैदा हो जाता था. इसीलिए माँ कालरात्रि ने रक्तबीज का पूरा खून अपने मुँह से पीकर उसका सर्वनाश किया और ईस धरती को राक्षसों के राज और आत्याचारों से बचाया.
माँ कालरात्रि का क्रोध रक्तबीज के सर्वनाश के बाद भी शांत नही हो पाया, और उनके क्रोध को शांत करने स्वयं भगवान महादेव को उनके पेरो तले सोना भी पड़ा . अब माँ काली का यें रौद्र रूप आज हम नवरात्रि की सातवें दिन पूजते है. उनके हाथ में तलवार है, गले में खोपड़ियों की माला है, मुँह पूरा खून से सना है और पेरों तले महादेव जी है …
ईस पूरी कहानी को मैंने कविता के साथ पेश करने प्रयास किया था, और ये है मेरा माँ कालरात्रि को सादर प्रणाम.
छलकपट का दौर था, देवों पे प्रहार था, राक्षसों का राज था, फैलता अंधेरा था… माँ को बस पुकारा था, तू एकही अब सहारा था, इन राक्षसों को मारना, बस तुझे ही संभव था.. तू गधे पे हो सवार थी, हात में तलवार थी, ये राक्षसों को ढेरती, तू कालरात्रि रूप थी.. ये पार्वती का दाव था, माँ चँड़ी का तू अंश था, माँ दुर्गा का ये रूप था, जिसने धर्म को बचाया था
By Ketan Phadke

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