महसूस (Mehsoos)
By Ankita Sah
बड़ी मुद्दतों से कुछ लिखा नहीं है,
क्या लिखूं अभी तक ये सूझा नहीं है ।
कितना कुछ है लिखने को, मगर ये कलम रुक जाती है,
मन की छिपी गहराइयों में कई गोते लगाती है ।
क्या लिखूं मैं अपने बारे में?
या लिखूं जो कहानियां छिपी है इन नज़ारों में?
चाहे हो खिलखिलाती धूप, या फिर तूफानी मौसम,
हो बारिश की बूँदें, या उनके छूने से नदी में उठती तरंगें ।
ये नभ छूते पर्वत जिनसे मिलने आते हैं बादल,
कभी इंद्रधनुष का आँचल फैलाये, तो कभी ओढ़े तारों की चादर ।
वो सर्दी के मौसम में सुबह जमीन पर चमकते ओस सुनहरे,
वो मुस्कुराते चेहरे जिनके पीछे छिपे होते हैं, अक्सर घाव गहरे ।
ध्यान से सुनो तो हर एक चीज कुछ कह जाती है,
रौशनी को छोड़िये जनाब, चुप्पी साधे अँधेरे भी कई दास्तान बयान कर जाती है ।
बस कमी है तो इन्हें सुनने की, समझने की,
कमी है तो इन्हें महसूस करने की ।
काश की हम अपनी व्यस्त जिंदगी से कुछ पल निकल पाते,
कुछ बड़ा हासिल करने की चाह में, इन छोटी छोटी खुशियों को यूँ ही न भूल जाते ।
काश की हम थोड़ा ठहर पाते ।
माना की कुदरत के इशारे समझना आसान नहीं, आखिर उनमें जुबान नहीं,
पर क्या हम इंसान एक दूसरे को ही हैं समझ पाते?
इस से ज्यादा क्या लिखूं अब, बस दिल में यही बात आती है -
क्या हम फिर से महसूस करना सीख पाएंगे?
मशीन बनते जा रहे हैं धीरे धीरे, क्या हम फिर से इंसान बन पाएंगे?
शायद फिर हम जान पाएंगे एक दूसरे का दर्द,
जो आज कल हम सुन कर भी नहीं समझ पाते ।
By Ankita Sah

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