महबूब की जुदाई
By Abhishek Choudhary
दौलत, मंज़िल, परछाई और दाग़-ए-ग़म
महबूब की जुदाई कहर-ए-सितम।
रक़ीबत का मोल या ज़ख्म पे मरहम
दर्द-ए-मोहब्बत या हिज़्र-ए-सनम।
दश्त-ए-ख्वाहिशात में मिलता रहा वहम
तुम, तुम नहीं, मैं, मैं नहीं, तुम-मैं यानि हम।
उसका फ़िराक़ यानि कहर-ए-करम
इंतजार उसका अगले जनम।
By Abhishek Choudhary

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