मसलों का बाजार
By Sachin Madhukar Gote
माहौल ए मसलों का बाजार है
कोई हल मुनासिब निकलता नहीं।
बस बात होती है, और लब सहमते है..
रूह से असर मुनासिब निकलता नहीं।
कातिलों ने भी कई वार ऐसे किए।
सांसे अटकी रही , जां निकलती नहीं।
इबादत से भी बस सब्र हासिल हुआ।
दुवाओं में जो जिक्र था वो तो मिलता नहीं।
हाले आफताब अब क्या बयां हम करे।
रोशनी है मगर, नुर उफनता नहीं।
By Sachin Madhukar Gote

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