मर्यादित गर्व
By Navneet Gill (नवनीत गिल)
हुए गुलज़ार,
शजर और बाज़ार,
आई, दीवाली,
करने रोशन रात काली।
था चहुंओर,
उल्लास भरा शोर,
छेड़ता तरंग,
दूर बजा जो कहीं मृदंग।
हृदय अंदर,
थमा गुबार समंदर,
हुआ गायब,
पल छिन्न को पा, नायाब।
देखो सौग़ात,
बैठे भूल, हर मात,
गौरवपूर्ण पर्व,
करना सदा मर्यादित गर्व।
By Navneet Gill (नवनीत गिल)

Comments