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मर्दों का मौन चीत्कार

Aug 11, 2025
2 min read

By Preetika Gupta


आज के युग में, ये कैसा विधान है,

नारी के उदय का, क्या ये नया मान है?

पुरुष खड़ा विस्मित, असहाय और हैरान है,

किस अपराध में लिप्त, क्या ये उसका अपमान है?


जो दुर्गा थी कभी, अब रूप है चंडी का,

अधिकारों के ओट में, बढ़ता उन्माद है।

हर छोटी बात पर, शब्दों का आघात है,

पुरुष का गौरव, जैसे अब राख है।


प्यार की जगह अब, अधिकार का रोना है,

हर रिश्ते में बस, अपना ही सोचना है।

मर्द बेचारा सोचे, ये कैसा बिछौना है,

इज्ज़त की गठरी पर, अब उसे ही खोना है।


घर की शांति भंग, बाहर भी न चैन है,

हर बात में आगे, करती वो क्लेम है।

छोटी सी गलती पर, बड़ा उसका इल्ज़ाम है,

पुरुष का वजूद, अब बस एक नाम है।


नारी शक्ति का, ऊँचा परचम,

उसके आगे, कहाँ कोई हमदम?

आँखों में आँसू, पर होंठ सिले,

मर्दानगी का, कैसा ये छले?


सुबह से शाम तक, इक बोझ उठाए,

चलता है वो, हर दर्द छुपाए।

रिश्तों की बेड़ी, फर्ज की दीवार,

अंदर ही अंदर, टूटे हर बार।


बेटा होकर, पति बनकर भी,

कभी पिता, कभी प्रेमी बनकर भी।

करता है सब, पर बदले में क्या?

अत्याचारों का, बस एक सिलसिला।


कभी ताना, कभी व्यंग्य का वार,

बिन बात के, सहता हर प्रहार।

घर की शांति, बनी रणभूमि,

उसकी आहट भी, बन जाती सूमी।


समाज कहे, 'पुरुष है तू, बलवान',

पर भीतर से, वो भी एक कोमल इंसान।

जब हृदय उसका, होता है आहत,

कहाँ जाए, किसे सुनाए ये व्यथा?


थाने से लौटे, कचहरी से भी,

हर जगह से, मिली मायूसी।

कानून की आँखें, उसे न देखें,

दबी आवाज़ें, कौन परखे?


ये कैसी दुनिया, ये कैसा विधान,

जहाँ पुरुष का, होता अपमान।

दर्द उसका, बस मजाक बने,

मौन चीत्कार, कोई न सुने।


कब टूटेगी ये, खामोशी की दीवार,

कब होगा उसके, दर्द का दीदार?

एक दिन शायद, वो भी बोलेगा,

अपने हकों की, दुनिया तोलेगा।


कब तक सहेगा वो, ये ताने, ये वार?

कब तक टूटेगा वो, होकर लाचार?

बदलाव ज़रूरी है, समझो ये पुकार,

नहीं तो रिश्तों का, होगा बंटाधार।


संदेश की गहराई:

यह कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि लिंग समानता का अर्थ केवल महिलाओं के उत्थान से नहीं, बल्कि पुरुषों के अधिकारों और सम्मान की सुरक्षा से भी है। यह एकतरफा सोच को चुनौती देती है और एक संतुलित समाज की आवश्यकता पर ज़ोर देती है। इसमें यह भी बताया गया है कि अगर हम इस समस्या पर ध्यान नहीं देंगे, तो यह रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने को और नुकसान पहुँचा सकती है। यह पुरुषों की उन अनदेखी पीड़ाओं और संघर्षों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह कविता एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जहाँ सभी लिंगों को सम्मान और समानता मिले।


By Preetika Gupta


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