मना क्यों नहीं लेते...
By Deepak Kulshrestha
आवाज़ दे के खुशियों को बुला क्यों नहीं लेते,
रूठे हो अगर खुद से तो मना क्यों नहीं लेते.
कब तलक देखोगे राह रात के ढल जाने की,
तुम इशारे से उजालों को बुला क्यों नहीं लेते.
गिला ये कि पास हो कर भी वो दूर ही रहा,
थोड़ा ही सही उसे खुद से चुरा क्यों नहीं लेते.
तोहफ़े में लाया है वो शिकवा मोहब्बत का,
तुम दुआओं सा उसे माथे से लगा क्यों नहीं लेते.
क्या होगा हासिल इन अंधेरों की गुफ़ाओं में,
इन अंधेरों में कोई चाँद जला क्यों नहीं लेते.
अपनी आँच में जल जाओगे कोयलों की तरह,
इक दरिया सा सीने में बसा क्यों नहीं लेते.
हर अजनबी चेहरे को पहचानता है आईना,
झूठे ही सही खुद से रिश्ते बना क्यों नहीं लेते.
By Deepak Kulshrestha

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