मन की गाँठें
By Manisha Nirmal Badale
"मगर वे आपकी छोटी बहन हैं मम्मी! आप इस तरह से पिछले छह महीनों से उनसे नाराज़ हैं कि न तो आपने उनका फ़ोन उठाया है और न ही उन्हें फ़ोन किया है। ऐसा कब तक चलेगा?" अपेक्षा ने अपनी सास मोहिनी जी से कहा। मोहिनी जी के चेहरे पर उदासी थी मगर आँखों में हल्की नाराज़गी। उन्होंने नाराज़ स्वर में कहा, "नहीं अपेक्षा, अब बस हो गया। गंगा छोटी बहन है तो क्या हुआ? बच्ची तो नहीं है ना? दो-दो पोते हैं उसके। इतनी समझ तो होनी चाहिए ना कि बड़ी बहन से किस तरह बात की जाए? पहले भी बहुत-सी गलतियों के लिए माफ़ कर चुकी हूँ उसे लेकिन अब नहीं।" यह कहकर मोहिनी जी हॉल से उठकर अपने कमरे में चली गईं। अपेक्षा ने एक गहरी साँस ली और सर हिलाकर अपने काम में लग गई।
मोहिनी जी सत्तर वर्ष की एक महिला थीं। पढ़ी-लिखी समझदार। उनकी एक ही बहन थी, गंगा। दरअसल गंगा जी को जन्म देते समय ही मोहिनी जी की माँ ने अपने प्राण त्याग दिए थे। उसके बाद उनके पिता जानकीनाथ जी ने दूसरी शादी नहीं की यह सोचकर कि दोनों बहनों को सौतेली माँ के हाथ में देने से अच्छा है खुद ही उनकी परवरिश करो। इसीलिए वे अपनी बच्चियों के पिता के साथ-साथ माँ भी बन गए। गंगा जी के जन्म के समय मोहिनी जी चार वर्ष की थीं। एक-दो वर्ष में ही उन्हें समझ आ गया था कि उनका परिवार सामान्य परिवार की तरह नहीं है जहाँ माँ और पिता अलग-अलग लोग होते हैं। उनके पिता, उनकी माँ, उनका भाई सबबकुछ उनके पिता ही हैं।
इसी कारण मोहिनी जी समय से पहले ही परिपक्व हो गई थीं। जिस उम्र में लड़कियों के हाथों में किताबें और गुड्डे-गुड़िये होते हैं, मोहिनी जी ने कलछी और स्टोव संभल लिए। वे अब अपने पिता के साथ मिलकर अपनी छोटी बहन को पाल रही थीं। पिता ने उनकी पढ़ाई कभी नहीं रोकी। मोहिनी जी को पढ़ाई में बहुत रूचि रही। उन्होंने अपना पोस्ट-ग्रेजुएशन करके बीएड भी किया और एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी भी।
गंगा जी बहुत लाड-प्यार में पलीं और जानकीनाथ जी ने भी उन्हें बिन माँ की बच्ची समझकर उनकी हर ज़िद हमेशा पूरी की। लेकिन वे दोनों यह नहीं समझ सके कि ऐसा करके वे उन्हीं की ज़िन्दगी मुश्किल बना रहे हैं। अब गंगा जी बहुत ज़िद्दी हो गई थीं। उन्हें हर चीज़ अपने मन से करनी होती थी वरना वे मुँह फुलाकर बैठ जाती थीं। एक-दो बार जानकीनाथ जी ने मोहिनी जी से कहा भी कि गंगा को बात समझनी चाहिए लेकिन उनका कहना था कि वह तो इतनी छोटी है, जब बड़ी होगी तब सब समझ जाएगी।
समय के साथ-साथ दोनों बेटियाँ बड़ी हो गईं और बहुत अच्छे घरों में उनका ब्याह रचाने के बाद जानकीनाथ जी ने भी एक दिन इस दुनिया से विदा ले ली। अब मोहिनी जी और गंगा जी एक-दूसरे की दुनिया थीं। पिता के जाने के बाद दोनों का आपसी बॉन्ड और भी मज़बूत हो गया था। हर रोज़ फ़ोन पर बात करना, जब मौका मिले, एक-दूसरे के घर जाना। बहुत सुन्दर दुनिया थी उनकी।
गंगा जी अधिक लाड-प्यार में थोड़ी मुँहफट हो गई थीं और मोहिनी जी ज़िम्मेदारी संभालते संभालते थोड़ी कड़क स्वभाव की। कभी-कभी गंगा जी कुछ ऐसा कह जाती थीं जो मोहिनी जी को चुभ जाता था मगर छोटी बहन समझकर वे चुप रह जाती थीं। कभी बात ज़्यादा हो तो वे उन्हें टोकती भी थीं मगर गंगा जी उसे हँसी में उड़ा देती थीं। मोहिनी जी कुछ कहती नहीं थीं मगर उन्हें बुरा लगता था।
एक दिन फ़ोन पर बातों-बातों में मोहिनी जी ने कहा, "गंगा, मुझे लगता है कि हमारा गाँव का घर अब बेच देना चाहिए। बापू तो हैं नहीं और हम दोनों वहाँ जाकर रहेंगी नहीं। तो उसे रखकर क्या करेंगे? उल्टा उसकी बराबर देखरेख न होने के कारण वह धीरे-धीरे खँडहर ही बन जायेगा।" गंगा जी ने कहा, "पर दीदी, वहाँ तो हमारे बापू की और हमारी बचपन की यादें हैं। और मुझे तो नहीं पर तुम्हें तो माँ की भी कुछ धुँधली यादें होंगी ना? ऐसे कैसे हम वो घर बेच सकते हैं?"
मोहिनी जी ने एक गहरी साँस लेकर कहा, "गंगा, बापू की यादें तो हमारे दिल और हमारी आत्मा में है। अपनी आँखों के सामने उस घर को खँडहर में बदलते देख मेरा दिल रो दिया था पिछली बार। वहाँ मुरली काका को कह देते हैं कि किसी को घर खरीदना है तो हम बेच सकते हैं। वे कीमत भी ठीक लगा देंगे।" गंगा जी हँसकर बोलीं, "वो तो ठीक है पर सौदा करने के समय हम दोनों वहाँ जाएँगी वरना कहीं तूने मुझे हिस्सा कम दे दिया तो?"
अपनी बहन से भले ही शायद मज़ाक में, लेकिन ऐसे शब्द सुनकर मोहिनी जी का दिल छलनी हो गया था। उन्होंने कुछ कहा नहीं मगर फ़ोन काट दिया। पूरा दिन उनके दिमाग में बहन की कही वह बात चल रही थी।
अब तो यह बहुत सामान्य हो गया था। उन लोगों ने मुरली काका को घर बेचने के लिए कह दिया था और वे ग्राहक ढूँढ रहे थे। इस बीच एक बार गंगा जी और मोहिनी जी जाकर घर भी देख आये थे। अभी तक कई बार गंगा जी पैसों की बात कर चुकी थीं मगर मोहिनी जी उसे भूल जाने की कोशिश करती थीं।
एक दिन गंगा जी किसी काम से मोहिनी जी के शहर आई थीं। वे मोहिनी जी से मिलकर वापिस जा ही रही थीं कि मोहिनी जी ने कहा, "गंगा, मुरली काका ने कहा है कि एक ग्राहक मिला है उन्हें घर के लिए। कब चलना है बता, हम जाकर काम कर आती हैं।" गंगा जी तुरंत बोलीं, "दीदी, मेरा जाना ज़रूरी है क्या? क्या है ना मुझे हिसाब-किताब समझता नहीं है। ये चले जायेंगे तो सब बराबर हो जायेगा।"
अब मोहिनी जी का सब्र का बाँध टूट चुका था। वे गुस्से-से बोलीं, "गंगा, आज बात साफ़-साफ़ कर ही लेते हैं। तू फ़ोन पर इतनी बार कहती थी कि मैं हिसाब ठीक से नहीं करुँगी और तुझे हिस्सा कम दूँगी, मैं इसे मज़ाक समझती थी। पर क्या तू यह बात सच में कहती थी? क्या तुझे सच में लगता है कि मैं अपने पिता के घर के पैसों में बेईमानी करुँगी? अरे बचपन में अपने हिस्से की मिठाई तुझे देने वाली बहन जिसने अपना सारा बचपन तुझे चंद रुपयों के लिए तुझे ठगेगी? ठीक है, तुझे अगर ऐसा लगता है तो अपने वकील से कागज़ात बनवा ले मैं उसपर साइन कर दूँगी। नहीं चाहिए मुझे एक भी रूपया उस घर को बेचकर। सब तू रख ले, बस?"
अब गंगा जी भी भड़क गईं और बोलीं, "क्या गलत कह दिया दीदी मैंने? तुम्हें इतना बुरा लगा है यानि क्या तुम्हारे मन में खोट है?" ऐसी बातें सुनकर मोहिनी जी के पैर लड़खड़ा गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। जिस बहन को खुद दूध पीती उम्र से बेटी जैसे पाला था, उसके मुँह से ये शब्द तो सच में ज़हर सामान लग रहे थे। वे रो रही थीं मगर गंगा जी गुस्से में बाहर चली गईं।
उस दिन से दोनों बहनों के बीच एक अबोला हो गया था और गुस्से की दिवार खड़ी हो गई थी। दोनों के पति और बच्चे जानते थे कि वे दोनों एक-दूसरे के लिए क्या हैं इसलिए उन्होंने उन दोनों को मनाने की कोशिश भी की मगर कुछ फायदा नहीं हुआ। कुछ समय बाद गंगा जी ने सबके कहने पर चार-पाँच बार मोहिनी जी को फ़ोन किया लेकिन मोहिनी जी अभी भी गुस्से में ही थीं। उन्होंने उनका फ़ोन नहीं उठाया जिसके लिए आज उनकी बहू अपेक्षा उन्हें समझा रही थी मगर मोहिनी जी का दर्द, गुस्सा और अहम् उन्हें रोक रहा था।
इसी तरह कुछ महीने और बीत गए। एक दिन मोहिनी जी नहाकर निकलीं तो पड़ोस से उन्हें ज़ोर-ज़ोर की आवाज़ें आने लगी थीं। उन्हें कुछ ठीक नहीं लगा तो उन्होंने अपनी बहू से पूछा, "अपेक्षा, क्या हुआ है पड़ोस में? इतनी आवाज़ें कैसे आ रही हैं?" अपेक्षा ने बुझे स्वर में कहा, "मम्मी, पड़ोस में जो ऑंटी हैं, उनकी बहू का अचानक निधन हो गया है। उसकी तो कोई उम्र भी नहीं थी और न ही उसे कोई बीमारी थी। पता नहीं रात को जो सोई तो सुबह उठी ही नहीं। दो छोटे बच्चे हैं उसके, न जाने उनका क्या होगा। मैं वहीं जा रही हूँ।"
यह सुनकर मोहिनी जी की आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उन्हें अपना बचपन याद आ गया कि कैसे छोटी-सी उम्र में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था। वे वहीं सोफ़े पर बैठकर रोने लगीं। अपेक्षा ने आकर उन्हें संभाला। शाम को उन पड़ोसी के घर कथा थी जो बारह दिनों तक चलने वाली थी। मोहिनी जी भी वहाँ गई थीं। पंडित जी कह रहे थे, "संसार के नियम अडिग हैं। जो आता है, उसका जाना निश्चित है। बस हमें पता नहीं होता कि कौन कब जाएगा। इसीलिए शायद कबीरदास जी कहकर गए हैं - काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब? हमें किसी भी बात को कल पर नहीं टालना चाहिए। किसी के साथ मनभेद न रखें। मतभेद ठीक है पर मनभेद जितनी जल्दी हो सके, मिटा लें। क्या पता कल आप हों न हों, जिसके साथ मनभेद है, वह हो न हो। अपने अंदर की कड़वाहट और गुस्से को तुरंत निकाल लेना चाहिए।"
पंडित जी तो और भी बहुत कुछ कहते मगर मोहिनी जी का दिमाग तो उन्हीं शब्दों में गुँथकर रह गया था जब पंडित जी कह रहे थे कि क्या पता कल आप हों न हों, जिसके साथ मनभेद है, वह हो न हो! मोहिनी जी वहाँ से उठीं और घर आ गईं। अपेक्षा को लगा कि शायद उनका मन ख़राब हो गया है इसलिए वे चली गई हैं। वह भी उठकर और पड़ोसियों को बोलकर उनके पीछे घर आई तो देखा मोहिनी जी के कमरे से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। अपेक्षा जल्दी से अंदर भागी।
अंदर जाकर उसने देखा कि मोहिनी जी फ़ोन पर थीं और सामने गंगा जी थीं। मोहिनी जी रोये जा रही थीं और कह रही थीं, "गंगा मेरी बहन, मेरी बच्ची, मैं नाराज़ नहीं हूँ तुझसे। तू बापू के घर के सारे पैसे रख लेना। मेरे लिए तो तू ही काफ़ी है। मुझे माफ़ कर दे गंगा जो इतने महीने मैंने तुझसे बात नहीं की।" सामने से गंगा जी बोलीं, "नहीं दीदी, गलती सिर्फ़ आपकी नहीं मेरी भी है। मैंने कितने कड़वे शब्द कहे आप से। ऐसी घटिया बात तो मज़ाक में भी मेरे दिमाग में नहीं आनी चाहिए थी फ़िर आई कैसे? मुझे भी कुछ नहीं चाहिए दीदी, उस घर के पैसे आप रख लो और मुझे सिर्फ़ अपना आशीर्वाद दो।"
दोनों बहनें रो-रोकर अपने मन की गाँठें खोल रही थीं और अपेक्षा दरवाज़े पर खड़ी प्यार से उन्हें देख अपनी बहती आँखें पोंछकर मुस्कुरा रही थी।
By Manisha Nirmal Badale

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