मजबूरी
By Shivam Mishra
मौलवी जी के घर में आग लगी! हल्ला हुआ! लोग इकट्ठा हुए और तय किया कि गया के यदि जल्दी ही आग बुझाई न गई तो पूरा शहर खतरे में पड़ जाएगा। लोग सलाह मशवरा करके समुंदर से मदद मांगने गए।
समुन्दर नींद से उठा, और ऊंघते हुए उसने पूछा, "किस शहर में आग लगी है?" बताया गया की फ़लां फ़लां शहर में, इतना सुनते ही समुंदर तिलमिला उठा और बोला, "अरे कमबख्तों! ऐसे छोटे मोटे शहर की आग के लिए तुमने मुझे नींद से उठाया!! इतनी सी बात के लिए यहाँ मुँह उठाए चले आए? जाओ किसी नदी पोखर के पास, मैं ऐसी छोटी मोटी आग बुझाने के लिए नहीं बना हूँ। राजधानी में आग लगे तो बताना।" इतना कह के, कुड़कुड़ाते हुए समुंदर ने अपनी पीठ उस ओर कर ली और सोने लगा। यहाँ खर्राटों की बढ़ती आवाज़, वहाँ आग की बढ़ती लपटें!
भागे भागे सब पहुँचे नदी के पास और मदद की गुहार लगायी। नदी ने अपने हाथ जोड़े और कहा," भैया! चलने को तो मैं चल दूँ, पर दिक्कत ये है कि आग जिनके घर में लगी है, मैं उनके धर्म की नहीं हूँ! अब कहीं उनकी मदद करने पर, मेरे धर्म वाले लोग बिगड़ जाएंगे तो मेरी बिना मतलब आफत होगी। मुझे क्षमा करें।" यह कहकर नदी आगे बढ़ गयी।
नदी से तालाब, तालाब से पोखर, पोखर से कुआं! शहर वालों ने सबसे मदद माँगी। सब की कोई न कोई मजबूरी निकली। तालाब की भाषा अलग थी, पोखर का गाँव दूसरा था, और कुएँ की जात ऊँची! अंत में, उखड़ी साँसें लिए वो लोग पहुँचे एक नाले के पास और उसे अपनी व्यथा सुनायी।
नाला तुरंत उठ खड़ा हुआ और साथ चलने को राज़ी हो गया। सब लोग खुशी खुशी नाले को अपने साथ लिए हुए आए तो देखा कि आग ने पास के कुछ और घर भी अपनी चपेट में ले लिए हैं। नाला आग बुझाने भागा ही था के इतने में मौलवी जी बीच में आ खड़े हुए और नाले से कुछ बात करने लगे…
धीरे धीरे मौलवी जी का चेहरा लाल पड़ने लगा, मानो एक आग उनके भीतर भी लग गयी हो । लोगों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन्होंने लोगों की तरफ़ देखा, और गला फाड़ के चिल्लाए, " नामुरादों! मेरी इज्ज़त डुबाना चाहते हो? ये का़फ़िरों की गली का नाला ही मिला तुम्हें आग बुझाने को? कोई ज़रूरत नहीं है इसकी!" इतना बोल के मौलवी जी ने पीठ उस ओर कर ली, और धूं धूं करती लपटों को देखने लगे।
आग बढ़ रही है!
शहर जल रहा है!
रात हो रही है!
आप सो जाइए…
By Shivam Mishra

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