मज़दूर
By Mrinalini Gajbe
एक मज़दूर!
मैं कौन, एक मज़दूर!
मेरी जान की कीमत?
शुन्य बटा सन्नाटा |
कभी मील मे काम करते – करते
मशीन मे हाथ फंसता,
कभी नाले में काम करते – करते
डूब ही जाता!
मैं कौन, एक मज़दूर!
कभी राह चलते कोई गाडी कूचल देती,
कभी फुटपाथ पर सोते में ही जान जाती!
मैं कौन, एक मज़दूर!
बच्चे मेरे कुपोषण से मरते ,
कभी बीमारी का इलाज न
मिलने पर ही मारे जाते ..
मैं कौन, एक मज़दूर!
दीहाडी चार मैं रोज़ कमाता
मुझे ही पूरा न पड़ता
परिवार को क्या खिलाता?
चिंता में डूब , शराब पी ,
सड़क किनारे पड़ा रहता
मैं कौन, एक मज़दूर!
बीवी भी निकल पड़ती मजदूरी पर ,
बच्चे मेरे घुमते बेघर !
सिर पर मेरे छत नहीं ,
इस धरती पर कोई चौखाना मेरे नाम का नहीं !
मैं कौन, एक मज़दूर!
किसी से क्या कहुं , ऊपरवाला भी मेरी सुनता नहीं !
कैसे सुनेगा , चढ़ावे के लिए मेरे पास रूपया नहीं !!
रूपया तो दूर मुझे तो मंदिरों में फटकने की इजाज़त नहीं !
मैं कौन, एक मज़दूर!
शिक्षा न मुझे मिल पायी, न मैं बच्चों को दे पाता ,
जाने कितनी और पीढ़ियाँ, इससे वंचित रह जाती ..
मैं कौन, एक मज़दूर!
गाव में मेरे पास खेत नहीं ,
जमींदार मुझे जीने देता नहीं ,
गठरी अपनी बोझ की उठाये ,
शहरों में भटकु तलाश में रोजगार की !
मैं कौन, एक मज़दूर!
मेरी जान की कीमत?
शून्य बटा सन्नाटा |
By Mrinalini Gajb

Comments