मंज़िल मंज़िल (Manzil Manzil)
By Ravi Soni
मैं मंज़िल मंज़िल कहता जाऊ
सब तकलीफे सहता जाऊ
काहे को मैं सुनु किसीकी
अपने मन की करता जाऊ
दरिया दरिया मेरी मंज़िल
नदियो सा मैं बहता जाऊ
जलु उद्यम के अंगारो में
सूर्य तेज सा तपता जाऊ
सहनशीलता सूर्यपुत्र सी
नींदाओ को सहता जाऊ
नज़र ध्येय पर अर्जुन जैसी
निशाना लक्ष्य पर साधता जाऊ
उड़ान भरू एक पवनपुत्र सी
बाधाओ से भिड़ता जाऊ
मनोबल जैसे महाराज शिवाजी
विपत्तियों में पलता जाऊ
महाराणा सा मेरा निर्णय
मरते दम तक लड़ता जाऊ
संघर्ष करू मैं राजा राम सा
जंगल जंगल चलता जाऊ
नज़र रखु मैं तेज बाझ सी
बादल चीर के उड़ता जाऊ
बढ़ते बढ़ते दिखेगी मंज़िल
कदम कदम मैं रखता जाऊ
स्वर्णाक्षरों में हो इतिहास मेरा
कर्म ऐसे कुछ करता जाऊ
मैं मंज़िल मंज़िल कहता जाऊ
सब तकलीफे सहता जाऊ
By Ravi Soni

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