मौन प्रार्थना
By Alka Singh
लाल बिंदी का पैकेट, हरी चूड़ियां बिखरी सी,
पीला दुपट्टा पड़ा हुआ है, एक कोने में मैला सा,
काले काले दो फीते लटक रहे हैं रस्सी से,
नीचे पड़ी दो मोजरी राह तक रही है कल से |
सूने सूने से आंगन में,
बैठे हैं सब ख़ामोश, मगर
मां का क्रंदन दिल चीर रहा
भाभी की सिसकी आती है,
भैया कुछ भयभीत खड़ा
पापा की गहरी सांसे आती हैं |।
मंजूर नहीं मां कर पाती, लाडो ना कभी अब आयेगी
छोटी सी उस अंगनाई में, खुशी नहीं लहरायेगी,
भाभी से चुहल अब कौन करेगा,
भैया की शिकायत कौन करेगा,
झुकते पापा के कंधों को
इज्जत से ऊंचा कौन करेगा?
चारों खाने चित्त इंसानियत है
घायल हर मासूमियत है,
पलभर में ही तार तार होती इज्जत है
कहीं भी नहीं अब जान की कीमत है ।
है भगवन, अब बहुत हो गया
सोता हुआ इंसान अब मर गया
बस यही है मेरी मौन प्रार्थना
अब तो लौट आओ प्रभु
अब तो लौट आओ |
By Alka Singh

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