मौत की जरूरत नहीं।
By Aditya Nandkumar Garde
अगर जीते जी कोई उसके लिए कह दे वो अच्छा है,
तो उस इंसान को, सच में मौत की जरूरत नहीं।
दिखावे की माला कब्र के सिरहाने खूब सिंधी जाएगी,
पर जो जुबा अभी एक कहे दे,वही दुआ है, उसे फिर मौत की जरूरत नहीं।
घरों में सुनी हँसी, बचपन की टूटे खिलौनों की ना राजी,
एक हँसी दे दो आज, फिर उस बच्चे को मौत की जरूरत नहीं।
वो बुजुर्ग, जिसकी आँखों में वक्त का हिसाब लिखा है,
उसके होंठों से ठीक हूँ हटाओ, हाथ थामों, उन्हें फिर मौत की जरूरत नहीं।
तस्वीरें दीवार पर नहीं, जिंदगी की यादों की गलियों में चलती है,
आज बोल दो तुम अच्छे हो, तो कब्र के फूलों को मौत की जरूरत नहीं।
वो दोस्त को माँ जिसे मेले में भुला दिया गया, रात को बात करो उससे,
एक बात कहो उसके जख्मों से, “कैसे हो?”, उसे फिर मौत की जरूरत नहीं।
जब आंसू छुपे हो गलतियों के पीछे, और वो माफी मांगने आए,
उसे कह कर “ माफ़ किया तुम्हें” चाय पर ले जाओ, फिर उसे मौत की जरूरत
नहीं।
जिसने प्यार निभाया पेड़ जैसा, खामोश और निस्वार्थ ऐसा,
उसे कभी छाँव की जरूरत पड़े, तो देकर देखो, फिर उसे मौत की जरूरत नहीं।
जो कल को हमारे लिए खबर बन कर रह जाए, आज अगर सुन लो उसे,
उसकी रात में हल्की सी रौशनी भर दो, फिर उसकी जिंदगी को मौत की जरूरत
नहीं।
जो पिता घर की दीवारों में चुप चाप हो बुजुर्ग हो गया,
बेटा आँखों में आँखें डालकर गले लग जाए, फिर उस पिता को मौत की जरूरत
नहीं।
जब दिलों में जिंदगी की कद्र शुरु हो जाए,
तब तस्वीरों पे रोने को, मौत की जरूरत नहीं।
कब्र पर फूल रखकर, जो शरीर की तारीफें की जाती है,
वो अगर शरीर में आत्मा होते की जा, तो उसे मौत की जरूरत नहीं।
जब प्यार ज़ुबान से नहीं, आंखों से कहा जाए,
तब आखरी सांस को भी, मौत की जरूरत नहीं।
मैं कहता हूँ, अगर जीते जी इंसान को इंसान का मतलब समझ आए,
तो आप उस इंसान को, फिर मौत की जरूरत नहीं।
By Aditya Nandkumar Garde

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