भूल भुलैया और इक बंजारा
By Gaurang (Gaur_Mats)
जिन्दगी का ज़र्रा ज़र्रा आ गया है इक सिरे पर, खड़ी हो कर रूह मेरी पूछती है दर्द भरी आवाज़ में- क्या है मोल इस जिन्दगी का, नाखुश किसे करेगा अब अपने काम से। ए खुदा तू ही बता दे, क्या जवाब दूँ इस सवाल का मैं, जिसका जवाब है गुमशुदा।
कैसे कहूं कि थक गया हूँ चलते हुए इस राह पर। टूटी हुई है पीठ मेरी, इस कदर चलते हुए, रास्ता अब तू दिखा दे, क्या है मुनासिब मेरे लिए। थक गया हूँ अपने ख्वाबों और आते चौराहों से, कि समझ नही आता किस राह पर आगे चलूँ।
फैली हुई यह रास्तों की भूल-भुलैया, अक्सर हैरान सा हो जाता हूँ, कि कहीं फिर से शुरुआती सिरे पर पहुँच ना जाऊँ। इसी कश्मकश के चलते अब चलने से भी डर लगने लगा है मुझे। चलते हुए इन रास्तों पर डर की इम्तिहाँ तब हो जाती है, जब वे नये होते हुए भी जाने पहचाने से लगते हैं।
अब तो इन्तज़ार है मुझे उस नावाक़िफ से इक बंजारे का, जो मुझे इस भूल-भुलैया के घुमावदार रास्तों से बाहर मेरी मंज़िल तक निस्वार्थ पहुँचा दे। उम्मीद करता हूँ कि वो बंजारा मुझे सूरज के ढलने से पहले मिल जाये, वो क्या है ना अन्धेरे की गिरफ्त में ऐसे रास्तों पर मैं अक्सर सहम सा जाता हूँ।
By Gaurang (Gaur_Mats)

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