भारत नहीं झुकेगा
By धनंजय प्रताप शर्मा
उत्तर दीशि में शोभित, पुलकित,
श्वेत वर्ण हिम पर्वतमाला
जहाँ विराजे कश्यप का स्वर,
जहाँ व्याप्त ज्ञानी की शाला,
जहाँ काली का दर्शन पाया,
चरण वैष्णो के अंकित हैं,
अमरनाथ जगति में भूषित,
मनुपुत्र किंतु शंकित हैं,
शंकित हैं तेरे लाल,
देवभूमि पर पड़ा अकाल,
देवालय की मूर्त खण्डित,
दानव होते महिमा मंडित,
दुधमुही मुस्कानों के स्वर,
माताओं की कुमकुम-रोली,
ललनाओं का श्रंगार जल गया,
भस्म हुई बहनों की चोली,
आतंकवाद के बोझ तले
क्यों दिल्ली की सरकारें?
अजमल को देकर सुविधाएं,
घर अपनों को दुतकारें,
घाटी के जर्जर मन में ढूंढो
अब भी मिलते हैं टूटे सपने,
उसकी पीड़ा कौन लिखेगा
जिसने लाशों में खोजे अपने,
कायर कहकर जग पुकारता
कर अर्थी पर झूठा क्रंदन,
स्मरण रहे की वहीं लिखेगा
नव भारत का गौरव वंदन,
आज अनगिनत हत्याओं से,
जीत-हार की शंकाओं से,
विपदाओं से, पीड़ाओं से,
डरकर नहीं रुकेगा,
भारत नहीं झुकेगा।
जो अपमानों ने सुलगाई है
वह प्रतिशोध की ज्वाला,
लो आज प्रकट है दावानल
बन मानव का रखवाला,
आतप, अंधड, झेल रहें है
अग्रिम पंक्ति के पुलकित दीपक,
आज हिंद को दिए चुनौती,
करता हिन्दू जन-मन उद्दीपक,
आज नहीं है किंतु-परंतु
शेष लक्ष्य का भेद,
आज पार्थ ले बाण साध
निर्मम हत्यारों पर अखेद
आत्म समर्पण क्या जानेगा,
जिसने देखा जौहर दमभर,
आज वीर को पहचानेंगी
सकल धरा, लोक और अंबर,
घाटी ने जिनको चुनकर मारा,
जिनके घर पसरा अंधियारा,
जिनकी आँखें आज सघन है,
प्रतिशोध की आज लगन है,
आज हिमालय तोड़ शिखाएं,
खोल सरित की आज जटाएं,
अग्निवंश के गौरवकुल की
आज सुनाता है गाथाएं,
तल्लीन करो अब रावलपिंडी,
लेकर भारत का ज्वार,
काश्मीर में नहीं दिखेंगे,
अब गैरों के हथियार,
आज शांति का निश्चय देकर,
प्रतिशोध की ज्वाला पीकर,
अमित वेदनाओं को सहकर,
अब रोके नहीं रुकेगा,
भारत नहीं झुकेगा।
By धनंजय प्रताप शर्मा

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