भला हुआ जो शक्ल मेरी देखकर वो डर गया(ग़ज़ल)
By Ananth
भला हुआ जो शक्ल मेरी देखकर वो डर गया
वो हुस्न-ओ-नफ़्स के नशे में था, नशा उतर गया।
ये घूरता है मुझको आइने से कौन अजनबी
जो आशना था शख़्स मेरा एक वो किधर गया।
ऐ दिल, किसी का अपना घर कहाँ तू, छोड़ भी ये ग़म
किराए का मकां तू, तुझको ख़ाली कोई कर गया।
भरा हो रख़्त1 जैसे ख़ाली देखकर कोई जगह
कोई जहां में इंतेज़ार-ओ-ऐतिबार भर गया।
पहाड़ ना हो गोया रेत से बना वो टीला हो
इक अह्द-ए-वफ़ा2 जो जब हवा चली बिखर गया।
परिंदों का बनों में जैसे इंतिबाह3 गूंज उठा
अजल4 को आता देख ज़हन ख़ामुशी से भर गया।
मैं एक पल गुज़ारने की मश्क़ में लगा रहा
वो पल जो दर पे मेरे आके बारहा5, गुज़र गया।
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1रख़्त: सामान
2अह्द-ए-वफ़ा: वफ़ा का वादा
3इंतिबाह: चेतावनी
4अजल: मृत्यु
5बारहा: बार-बार
By Ananth

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