बेलगाम सी ख़्वाहिशें
By Parul Bhargava
गूँजती हैं खामोशियाँ
जो हमारे दरम्याँ
गुफ़्तगू का फिर ताना बाना
बुनना चाहती हूँ ।।
बाँधती हूँ तमन्नाऐं
जो बहती हैं नदिया सी
प्रीत के पुल पर तेरे साथ
चलना चाहती हूँ ।।
होती हैं तलाशियाँ
तेरी, रोज इस दिल में
पा लूँ तुझे फिर,ऐसी राहें
चुनना चाहती हूँ ।।
बेलगाम सी ख्वाहिशें
जो भटकाती है मन
हमारे रिश्तों में सीमाऐं
खोजना चाहती हूँ ।।
बेनूर सी खुशियाँ
जो सिमटी हैं युगों से
उदासियों में चाहत के रंग
भरना चाहती हूँ ।।
By Parul Bhargava

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