बेनकाब मुसाफिर
By Sachin Madhukar Gote
है कौन हम..?
कोई राहगीर, या यूहीं बेनकाब मुसाफिर..
ना पता कुछ , के हासिल क्या इस सफर का..
बिता जो , अब मेरा नहीं,..
जो आएगा वो शायद मुझ सा नहीं..
जो कत्ल होता रहा लम्हा..
मुझमें उसका कोई निशां नहीं..
वो कोई तो है कहीं दूर..
जिसे मेरी तलाश है..
या मैं ही कहीं और हूं..
मुझसे ही दूर, मुझे ही ढूंढता हुआ..
वहीं बस मै आबाद हूं,
किसी और रूह में शामिल।
कोई और जिस्म लेकर..
कोई और लिबास में....
By Sachin Madhukar Gote

Comments