बेटियाँ
By Disha Kedia Gupta
ऐसा क्यूँ होता है!
किसी के न चाहने पर भी जन्म ले लेतीं हैं बेटियाँ.
बिन माँगी, अनचाही बेटियाँ.
बेटों की चाह में परिवार बढ़ाती बेटियाँ.
क्यूँ जन्म ले लेतीं है ये बेटियाँ?
कितनी मन्नत, कितनी इबादत करते हैं माँ बाप बेटों की ख़ातिर ,
पर जन्म जाती है बेटियाँ.
कोई ख़ुशी नही मनाई जाती.
कोई थाल नहीं बजाता.
पर पल जाती हैं,
बढ़ जाती है,
पढ़ जाती हैं बेटियाँ.
ये बेटियाँ!
समाज की नज़रों में खटकती है ( अरे लड़की हुईं है )
पर माँ बाप कि साँसो में बसती हैं,
सीने में धड़कन सी धड़कती हैं.
बहुत ही जल्द,
उम्र से पहले
सयानी हो जाती है बेटियाँ.
इच्छा या अनिच्छा से ब्याह दी जाती है.
पर फिर भी बिना किसी गिले शिकवे के अपना फ़र्ज़ निभाती है.
कभी कभी तो लगता है बेटी मेरी माँ बन जाती है.
चन्द पंक्तियाँ बेटी के नाम!
याद है मुझे ,
जब इसका जन्म हुआ था.
किसी ने मिठाई नही माँगी थी,
कोई बधाई नही बँटी थी.
बस ये गोद में आ गई,
ज़िन्दगी में समा गई.
इसके साथ साथ मैंने अपना बचपन जिया,
वो सब जो अपने बचपन में ना कर पाई, इसके साथ साथ किया.
वो ढेर सारी बार्बी,
और इतने सारे खिलौने,
हमारे बचपन में नही थे.
मैंने उनका मज़ा बेटी के साथ साथ ही लिया.
वो उसका तुतलाना,
ग़लती करके मुझसे आँखे चुराना,
फिर मुझसे रूठना कभी, कभी मुझे मनाना.
सब मैंने अंचल में भर लिया.
अब वो बड़ी हो गई है!
मन के एक कोने में मायक़े को छिपाकर,
ससुराल की सारी ज़िम्मेदारी निभा रही है.
पर फ़ुरसत के पलों में,
उस कोने को खोल कर बैठ जाती है आजकल.
माँ अब बूढ़ी हो गई है,
ये अहसास है उसे हर पल.
अब जब भी आती है,
मुझे सम्भालती है.
अरे आप अब भी स्न्स्क्रीन नही लगाती हो?
और ये डॉक्टर ने विटामिन दिया क्यूँ नही खाती हो!
सारी पुरानी पुरानी साड़ी अब हटाओ !
और हाँ, अब तो एक अच्छे ब्राण्ड का पर्स ले आओ.
ढेर सारी नसीहतें, ढेरों हिदायतें!
सच में ,
अब यही मेरी माँ बन गई है!!!
क्यूँ कहते है लोग इनको पराया धन,
कभी टटोल कर देखना अपना मन,
कितनी अपनी है बेटियाँ..
By Disha Kedia Gupta

Comments