बेटियाँ
By Rashmi Abhay
बेटियां होती हैं घर की रौनक खिलखिलाती हैं तो बिखरती है इंद्रधनुषी सी छटा लाड़ दुलार से पली बेटियां जब बैठती हैं डोली में उस वक्त उनकी बिदाई पर काँपता हैं...
पिता का हाथ भाई की कलाई औऱ साथ ही काँपता हैं बहन का बचपन बेटियों की बिदाई पर काँप उठता है माँ का कलेजा घर की दीवारें औऱ कांपती हैं आँगन की वह चौखट भी जिसमें कभी बांधी थी शगुन का एक सिक्का बरक्कत की मौली और नजरबट्टू का टीका।
By Rashmi Abhay

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