बेखबर मैं
By Harshita Shrimali
जिन्दगी की राहों में, इन छोटी मोटी बातों में,
कब जीना मुझे आ गया, मुझे ही खबर नहीं।
सोचती हुॅं हर दफा, कोई राजी तो कोई है खफा,
कब चुप रहना मुझे आ गया, मुझे ही खबर नहीं।
ढूँढती हुॅं हर जगह, इन गमों की एक वजह,
कब हारना मुझे आ गया, मुझे ही खबर नहीं।
चाँद को ढलने ना दूँ, सूर्य को उगने ना दूँ,
कब ठहरना मुझे आ गया, मुझे ही खबर नहीं।
रोज में उठती तो हूँ, पर मन है जो जगता नहीं,
कब नींद आनी बंद हुई, मुझे ही खबर नहीं।
मन में उठते इन सवालों, के जवाब है गुम कहीं,
कब स्वीकारना मुझे आ गया, मुझे ही खबर नहीं।
By Harshita Shrimali

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