बे सबब दूरियां बढ़ जाएं तो
By Niharika Singh Parmar
बे सबब दूरियां बढ़ जाएं तो
जज़्बात घुटकर मार जाएं तो
अपना साया भी साथ ना हो
रातें तन्हा गुज़र जाएं तो
जाने नज़र किसकी थी
चढ़कर जो ना उतरी जाए
दिन बढ़ते और वक्त गुजरते
साज़िश उसकी बढ़ती जाए
वक्त जैसे ही अपना हो
हालात जुदा हो जाएं तो
अपना साया भी साथ ना हो
रातें तन्हा गुज़र जाएं तो
उसकी उम्मीद मेरे दिल को
सहारा देती है मानती है
वक्त बे वक्त ही सही
अपना तो बना जाती है
मुमकिन सी उम्मीदें सारी
टुकड़ों में बंट जाए तो
अपना साया भी साथ ना हो
रातें तन्हा गुज़र जाएं तो
By Niharika Singh Parmar

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