बिस्तर और मैं
- Hashtag Kalakar
- Dec 11, 2025
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By Aaryan Gupta
गहरी ठंडी रात का रोज़ बेसब्री से इंतज़ार होता है मुझे,
मानो जैसे रोज़ अपने बिस्तर से प्यार होता है मुझे।
जब 10 बजते ही चादर में खुद को लपेट लेता हूँ,
मानो अपनी सारी तन्हाई एक पोटली में समेट लेता हूँ।
देर अँधेर में, चाँद खिड़की से ताकता है मुझे,
मैं उसको देख आँखें मूँद लेता हूँ,
मानो पलकें पड़ते ही सब नाते मिट जाते हों,
ऐसे मैं उस बिस्तर पर सुकून ढूँढ लेता हूँ।
फिर एक पल बाद हसीन ख़्वाबों का दीदार होता है मुझे,
यूँ रोज़ अपने बिस्तर से प्यार होता है मुझे।
हवाएँ दूर से पैग़ाम लेकर आती हैं,
मानो बरसात की बूंदें कानों में गुनगुनाती हैं।
उसी वक़्त मैं एक करवट लेकर, तकिए को बाहों में भींच लेता हूँ,
हर कसक पूरी करते हुए, हर अंगड़ाई खींच लेता हूँ।
फिर भी रोज़ उठता हूँ अपनी मजबूरियों के तले दबते हुए,
वरना कौन छोड़ेगा ये बिस्तर सिसकते हुए।
उस दफ़ा अपना तन्हा दिल महसूस होता है मुझे,
पलटता हूँ एक नज़र, और फिर अपने बिस्तर से प्यार होता है मुझे।
By Aaryan Gupta

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