बिल्ली
By Akanksha Singh
आज आई थी वो फिर से
दबे पाँव लेकर
धीमे-धीमे
कुछ डरी-डरी सी
हर एक आहट से वाकिफ़
कान लगाए बैठी थी
मेरे पलंग के नीचे
बहुत ख़ामोश
एक सुकून-सा था
उसके चेहरे पर
मगर मुझे एक लकीर
ख़ौफ की भी नज़र आई
न जाने किसने खींच दी थी
जिसे ये अब अक्सर लिए घूमती है
गाँव-गाँव
शहर-शहर
देर तक हम बैठे रहे
आँखों में आँखें डाले
नज़र से नज़र मिलाए
उसकी जमाल चमकीली आँखें
थीं बेहद इज़्तराब
वो चली गई
इस अधूरी हसरत में कि
फासले अगर कम हों
तो शायद फिर कोई बात चले
By Akanksha Singh

Loved it❣️
Beautiful ❤️❤️
Keep shining and writing
Pure magic in words ✨
Great flow of words