बिल्कुल असली
By TANMAY SOLANKI
" यह फुलझड़ी पुरानी है..... 5 सेकंड जली और फिर भुज गई.... यह क्या पुराना माल बेच रहे हो?"। मैंने दुकानदार से शिकायत की। " नया माल क्या तुम्हारे पिताजी की फैक्ट्री से आएगा...... जानते नहीं हो..... 2 साल से लॉक डाउन है.... गनीमत समझो कि कुछ तो मिल रहा है। दुकानदार ने उल्टा जवाब दिया। "अरे भाई बेचने से पहले बता तो देते कि सब पुराने हैं.... मैं नहीं लेता..... दाम तो तुमने पूरे लिए...... ये सरासर बेईमानी है"। मैंने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा। " देखो बाबू जी.... लेना है तो लो वरना आगे बढ़ो..... टाइम खोटी मत करो"। मैं दुकानदार का रवैया देखकर हैरान था। बजाएं अपनी गलती मानने के वह तो उल्टा मुझे ही सुनाए जा रहा था। मैंने भी गुस्से में जवाब दिया " अब हमें तुम्हारे यहां से कुछ भी नहीं......" " अजी लेना क्यों नहीं है..... दिवाली तो मनानी ही है"। बीच में मेरा दोस्त अजीत बोल उठा। " अरे यार क्या बात कर रहे हो..... देख नहीं रहे....."। " सब देख रहा हूं और सुन भी रहा हूं...... मुझे बात करने दो...... तुम बस शांति से खड़े रहो"। मुझे तो अजीत की यह हरकत बिल्कुल समझ नहीं आ रही थी l " हां भाई .....यह बताओ ......यह 20 पैकेट फुलझड़ी कितने की दी?"। अजीत ने सामने रखे फुलझड़ी के कुछ पैकेट उठाते हुए पूछा। " बाबूजी... दाम तो वही है जिसमें आप ले गए थे...... कोई नया थोड़े ही है l₹25 रुपए का एक पैकेट"। फुलझड़ी वाले ने मुस्कुराते हुए कहा। उसे शायद यह एहसास हो गया था कि हम ना सिर्फ मजबूर थे बल्कि हमारे पास और कोई चारा भी नहीं था। वह यह भी जानता था कि आसपास पटाखों की कोई और दुकान नहीं है और हम चाहते हुए भी कहीं नहीं जा सकते।
" हां भाई तो लाओ .....बांधो 20 पैकेट ......आज दिवाली मना ही लें"।
" मगर अजीत यह जानते हुए भी कि यह"।
मुझे बीच में ही टोकते हुए अजीत बोला" यार लेने दो ना ....क्या प्रॉब्लम है"।
पटाखे लेकर हम लोग पास की ही दुकान पर 'लल्लू - लाल' की मशहूर चाट खाने चले गए।
पहला गोलगप्पा मुंह में रखते हुए मैंने पूछा," यार..!... यह तुमने क्या किया?"।
" अरे तुम्हारी दिवाली मना दी.... और क्या किया?"।
अजीत ने अपनी चिर- परिचित मुस्कान के साथ जवाब दिया।
" यार..... मजाक मत करो.....! बताओ यह सब क्यों किया?"।
मेरे उतावलेपन की कोई सीमा न थी।
" अच्छा बताओ .....हमने कितने रुपए के पटाखे लिए?"।
" पूरे 500 के...!... तुम्हारे हाथों में लहराता हुआ नोट मुझे बखूबी याद है"।
" बस मेरे दोस्त..... ये उसी नोट का कमाल है कि तुम्हारी असली दिवाली मन गई"। अजीत ठहाका मारकर हंसा।
" मतलब?... यह असली दिवाली क्या होती है..... मैं समझा नहीं"। मैंने अनभिज्ञता जाहिर की। " अरे भोले भंडारी..... उसके नकली पटाखों को मैंने अपने नकली नोट से खरीद लिया और तुम्हारी असली दिवाली मनवा दी..... बस इतनी सी बात है"। अजीत मुझे घूरता हुआ बोला। " क्या.... यह तुमने कैसे किया..... तुम्हारे पास नक़ली नोट आया कहां से?"। मेरे तो होश फाख्ता हो गए थे l " यह नोट मुझे बनारस में किसी दुकानदार ने दिया था.... जब मैं वापस कानपुर आया..... तो देखा यह नकली है..... बस फिर क्या था.....! मैंने भी सोच लिया था.... यह धोखेबाज नोट किसी धोखेबाज को ही पकड़आऊंगा.... और लो..... आज वह दिन आ गया"। " मान गए अजीत तुमको...... मगर यह तो बताओ...!... इन नकली पटाखों का क्या करें?"। " भाई मेरे....! यह तो तुम जानते ही हो कि कोरोना ने हर चीज की रफ्तार आधी कर दी है....! तो फ़िलहाल
तुम इन आधी फुलझड़ीओ से ही अपनी पूरी खुशियां मनाओ और भाभी और चुन्नू के चेहरों की खुशी देखकर भगवान के गुण गाओ..... क्यों कैसी रही दिवाली?"।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा" बिल्कुल असली"।
By TANMAY SOLANKI

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