" बिना स्वार्थ के कोई किसी से प्रेम नहीं करता "
By Shweta Bhatnagar
सच है , मगर करेले सा कड़वा। अब करेला क्यों कहा ? कारण है ,क्योंकि करेला कड़वा ज़रूर है
पर खाने से फायदा ही करता है ,शरीर को साफ़ कर देता है। बिलकुल वैसे ही, ये “सच” भी ,
मन और दिल के ऊपर जमी धूल को साफ़ कर देता है, और जो हम दूसरों से उम्मीदे गाँठ
बैठते हैं उन्हें भी खोलता है ।
“ बिना स्वार्थ के कोई किसी से प्रेम नहीं करता “
‘प्रेम’ भ्रम है ,दिल को खुश रखने का साधन। लेकिन ‘स्वार्थ’ भी इतना नकरात्मक शब्द नहीं
है,ये कोमल भी है और कठोर भी ,निर्भर करता है की किस उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है। और
इस पूरे लेख में ‘कठोर स्वार्थ ‘ का कोई स्थान नहीं है ,इसलिए आगे पढ़ने से पहले अपने मन
और मस्तिक्ष को कोरा कर लें, जैसे नए विचार का विश्लेषण हो सके।
अपनी कही बात को कुछ उदाहरणों से समझाती हूँ।
1. एक बार मेरे एक करीबी रिश्तेदार की धरम पत्नी का निधन हो गया ,शोक का मौहाल था ,हर
कोई उदास ,जिन सज्जन की धर्मपत्नी थी ,वो एकदम टूटे से दिखाई पड़ते थे ऐसा प्रतीत होता है
की इस दुःख ने उनको भी निष्प्राण सा कर दिया है ,किसी चीज़ का कोई होश नहीं ,कपड़ो की कोई
सुध-बुध यही ,कई दिन नहाये तक नहीं ,क्योकि पता ही नहीं था कि ,कौन सा सामान कहाँ रखा
है. कभी उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ा ,सब बातों का ध्यान तो उनकी धरम पत्नी ही रखती थी
,एक गिलास पानी भी कभी अपनेआप नहीं लिया होगा। बच्चे उनके परेशान कि पिताजी घर में
अकेले कैसे रहेंगे ,हम लोगो के साथ चलने को भी तैयार नहीं हैं ,अपना ख़याल कैसे
रखेंगे ?
कुछ वक़्त तक तो रह -रह के उन कि आँखों में आँसू आ जाते थे ,कभी अलमारी से खुद कपडे
निकालते समय ,तो कभी खाने में कामवाली के हाथ कि बनी रक्खी ठंडी रोटी कहते समय।
कई बार तो उन्होंने टूटे बटन वाला कुर्ता भी पहना।
पर कहते हैं न कि वक़्त से बड़ा मरहम कुछ नहीं होता ,धीरे -धीरे सारी अनियमता ढर्रे पे आ
गयी ,जीवन वापस से वैसे ही चलने लगा जैसे पहले थ। हाँ ,ये बात अलग है कि यादों पे
कोई पहरा नहीं होता , हमारे कमज़ोर पल में वो हमें धर दबोचना चाहती है और अक्सर
कामयाब भी होती है।
2. रोहन छोटा था ,एकलौता बच्चा ,बड़े लाड प्यार से पाला गया उसे। माँ कि तो आँखों का तारा था
और वो भी अपने परिवार वालों से उतना ही प्रेम करता था। उसकी मासूम सी चंचलता सब का
मन मोह लेती थी। जब अपनी माँ का पल्लू पकडे -पकडे दिन भर घूमता रहता था ,उसकी माँ
कभी झल्ला भी जाती थी कभी तो थोड़ी देर चैन से सांस लेने दिया कर,लेकिन बच्चा तो बच्चा
होता है उसे तो माँ के पास ही सुख मिलता है ,उसकी सारी ज़रूरते पूरी होती हैं।
पर समय के पैरों में पहिये और हाथों में पंख होते हैं ,कब चलते -चलते दौड़ने लगता है और
फिर दौड़ते- दौड़ते उड़ जाता है ,पता ही नहीं चलता। ऐसे ही छोटा सा रोहन भी बड़ा हो गया
,पहले कॉलेज ,फिर नौकरी फिर शादी और फिर अपनी नयी दुनिया में मगन हो गया ,माँ का
पल्लू भी कब का छूट गया ,लेकिन माँ के दिल से वो अहसास नहीं गया ,कभी मुस्कान तो
कभी टीस की तरह दिल में अपना घर बना लिया।
और ये मनमौजी वक़्त फिर नहीं रुका ,बढ़ता चला गया .
ऐसे अनेक छोटे छोटे रिश्ते हैं जो ज़रूरत और स्वार्थ से बंधे हैं ,चाहे उन सज्जन को ले लें
,चाहे ,रोहन हो या उसकी माँ को। उन सज्जन को सहारा था अपनी धरम पत्नी से ,वो उनके
ऊपर मानसिक,सामाजिक और शारीरिक रूप से निर्भर थे और जब उस निर्भरता का खम्बा
उखड़ा तो उनके कंधो को अकेले वो भार उठाना था ,इसलिए अनिश्चिंता और और अचानक पड़ी
ज़िम्मेदारी ने कुछ क्षणों के लिए उनको व्याकुल और कमज़ोर कर दिया ,और बाद में उन्ही
क्षणों ने उन्हें संभाल भी लिया ,आँखें नाम अभी भी होती हैं अपने जीवन साथी की याद में।
लेकिन याद क्यों आती है ? क्योकि आप अकेला महसूस कर रहे होते हैं ,उस कमी को भरने
वाला साथी नहीं होता।किसी का जाना हमारे जीवन में अधूरापन लाता है ,अस्थिर कर देता है
हमारे जमे जमाये तौर तरीको को। फिर ये प्रेम ज़रुरत और स्वार्थ से ही तो आया।
माँ और पिता का सुख संतान के सुखी और संपन्न होने में है ,तो ये भी तो स्वार्थ है लेकिन
‘कोमल स्वार्थ ‘,
जिन लोगो और जिन चीज़ों से हमें सुख मिलता है वो हमारी ज़रूरत बनने लगते हैं और हमें
लगता है की हमें उनसे प्रेम है। कोई कभी एक नज़र में पसंद आ गया तो इक्छा होती है की वो
हमें मिल जाए तो कितना सुख मिलेगा। “मिलेगा “ इस शब्द पे ध्यान दीजिये और ज़रा सोचिये
,क्या ये जो हमें “मिलेगा “ निज स्वार्थ है या प्रेम ।
इस बात को स्वीकारना सरल भी है और कठिन भी। सरल तब ,जब हम खुद से सच्चाई रखे
और दिल से दिल की बात होने दे । और कठिन तब जब भावनाओं की स्थापित व्याख्या को
आँख बंद कर के सच माने ,जैसे :-“ माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है “ ,निस्स्वार्थ नहीं होता
,कोमल स्वार्थ होता है ,क्योकि हम लोग अभी सन्यासी नहीं हुए तो स्वयं को प्रेम,मोह,सुख और
दुःख से अलग कर पाए।
लेकिन ये करेले वाला सच फिर भी यहीहै कि “ बिना स्वार्थ के कोई किसी से प्रेम नहीं करता “
By Shweta Bhatnagar

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