बिन लैला का 'मजनू '
By Akshar Tekchandani
सब्र का फल मीठा…होगा !
पर फ़कत सब्र भी प्यारा लगे |
इतनी अधूरी कहानियों को है भोगा,
की सब्र रखना,
कभी मजबूरी तो कभी ख़्वाहिश लगे |
हर कहानी की शुरुआत में,
मन में इक आशा जगे,
ये होगी मोक्ष-रुपी कहानी,
ऐसा हमारे दिल को लगे |
पर जब हर किस्से का अंत
हो जैसे-
भक् ! यार, क्या बे,
तब लगे, अधूरे किस्सों का ये ताज,
शायद हम पर ही है ज़्यादा फ़बे |
अब स्वीकार लिया है मैंने कि,
ये अधूरी कहानियाँ ही,
करतीं मेरी ज़िन्दगी को पूरा हैं |
इस सच को अपना कर,
वो भी मित्र लगे,
जिसने शायद,
छुपा रखा, बग़ल में छुरा है |
इन अल्फाजों को, मेरी निराशा मत समझो,
ये तो मेरी याद किये जाने की,
आशा है; अब समझो !
मुहब्बत दे-देकर, दे-देकर, इक दिन
इतना बिखर जाऊँगा,
की अनगिनत- अनकहे वाक्यों, अनघटित वाक़याओं,
की स्मृति में रह जाऊंगा |
अधूरी कहानी उसकी भी थी,
अधूरे किस्से मेरे भी हैं;
वो होगा लैला का, मैं तो
बिन लैला का मजनू कहलाऊंगा ||
पर मिटने से पहले, मर-मिटने से पहले
सिर्फ़ एक बार,
अपनी जीवन-कथा को रखूंगा भूतपूर्व,
और, कभी बात बने, हालात जमे,
तो इस मजनू की भी,
इश्क-ए-हयाती होगी अपूर्व |
ग़र फिरसे दिल टूटेगा,
तो फिरसे बिखरेंगे, और
हँसते हुए सह लेंगे,
बिन-शर्त, जहाँ में प्यार,
लुटाने की अपनी आदत है पुरानी,
इस संतुष्टी के संग, वक़्त आने पर,
बेझिझक
दुनिया को अलविदा भी कह लेंगे |
वो कहते हैं, एक सच्चा प्यार न किया
तो क्या ही किया ?
मैं कहता हूँ,
ग़र सच्चा प्यार ही सफ़लता का मांप-दंड है,
तो रोज़ किया, तो क्या ग़लत किया ?
बल्कि, क्या ख़ूब न किया ?
अब किसी की क्या गलती- कि
हम पे न आया महबूब का जिया |
हमें पागल कर गयी, और
उन्हें तनिक न भायी,
प्रेम की पायलिया !
हम में शायद ना मिला,
महबूब को उसका पिया |
पर माफ़ करना यार, हमने तो
हर दफ़े शिद्दत से जलाया था,
सच्चे प्रेम का दिया |
पहनूंगा जब अधूरी कहानियों से लदा,
अपना ये पूरा सा चोगा;
तब भी मेरे दिल का हर टुकड़ा कहेगा,
सब्र का फल मीठा..होगा !
मुस्करा के,
बेधड़क,
अपने दिल को सहलाऊंगा,
हज़ार बार टूटा है, हज़ार बार टूटने की है हिम्मत,
कोशिश सफ़ल तो है किस्मत,
और ना सफ़ल तो ना सही,
मरते दम तक, अपने बचे-कुचे
दिल को बहलाऊंगा,
वो होंगे लैला के,
वो होंगे लेले से,
पर,
मैं तो बिन लैला का मजनू कहलाऊंगा ||
By Akshar Tekchandani

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