बिखरा घर
By Kavita Sharma
बिखरा बिखरा घर मेरा
बिखरी सी मैं रहती हूँ
आधे अधूरे अल्फाज़ मेरे
कागजो पे सोई रहती हूँ
ना बारिश मे भीग पाई मैं
ना पत्तों को चुन पाई मैं
आधे अधूरे उन फूलो मे,तितलियो को ना देख पाई मै
जमे रहे मेरे कदम एक जगह
आयने मे खुद को भी ना देख पाई मे
अधेरा जाता रोशनी आती
कुछ इस तरह दिन को काटती हूँ
बिखरी स्याही टूटे काच
इन सपनो को भी ठीक से ना बुन पाई मैं
आधी नींद आधी रात
कुछ इस तरह रात गुजारती हूँ
चुन चुन के शब्दों को
मन के कोने मे भरती मैं
सोचती बस ये रहती हूँ
कैसे एक संभलती कविता लिखू मैं
बिखरा बिखरा घर मेरा
बिखरी सी मैं रहती हूँ।।
By Kavita Sharma

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