बिखर गए। टूटे नहीं।
By Ajeet Singh
मैं बहुत दूर खड़ा हूँ
वहीं बस नहीं खड़ा हूँ
जहां तुम आख़री बार
रुके भी थे और खुद भी खड़े थे
जब तुम बहुत अंदर तक चले आओगे
एक टूटा हुआ पेड़ मिलेगा
बिखरा सा पर जैसे जाग जाए किसी भी पल
मैं शायद वहाँ खड़ा था
पर तब तुम नहीं आए थे
या आ नहीं पाए थे
ख़ैर टूटे हुए पेड़ों से बात कौन करे
पूछे कि क्या कभी तुम यहीं खड़े थे
धुंधला सा याद है तुम्हारा आना
अब के आओगे तो मेरा ज़िक्र करना
फिर मैं भी खुद से और अनजाने में
कई सारे अर्थ बनाता हुआ
खूब दूर तक जा पाऊँगा
वहाँ नहीं आओगे तुम
आओगे भी तो टूटे हुए
बिखर गए पेड़ से क्या बात karoge
By Ajeet Singh

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