बिंदी
By Syed Aamir Razaa
शाम के करीब छः बज रहे थे, मौसम बेरुखी इख्तियार कर बरसने को तैयार अक्तुबर के सुहाने शाम में खलल डाल रही थी। सड़कों पर हलचल शुरू हो गई थी, हो भी क्यों न दूर्गा पूजा का खुमार तो महिनों पहले से ही चढ़ने लगता है और षष्ठी के दिन तो यह लाज़मी भी था। शहर अपने सारे काम-काज समेटने में जुड़ा हुआ था। सब की दूर्गा पूजा की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। बेमन पर जल्दबाजी में मेज़ पर पड़ी फ़ाइलों को निपटाया जा रहा था।
इसी भागदौड़ के बीच एक शख्स हर दो मिनट में अपना फ़ोन बड़ी बेचैनी से टटोल रहा था। दुसरों से ज्यादा तेजी में अपने काम को खत्म करने के लिए ज़ोर लगाए हुए था। इतने में उसके फ़ोन की घंटी बजती है, हाथ में फ़ोन लेकर जैसे देखता है तो वो अपनी ही जगह पर खुशी से कुद पड़ता है। खुश हो भी क्यों ना, आखिर उसे सालों से इस दिन का इंतजार था। वो इस साल दूर्गा पूजा कोलकाता में मनाने वाला था और उसका टिकट कन्फर्म हो गया था। वो जल्दी से अपनी फाइलों को समेट कर बौस के कैबिन जमा कर वहां से निकलता है और टैक्सी बूक करके घर को रवाना होता है। उसने पहले ही अपना समान बस्ते में ओरिया रखा था। यूं तो स्टेशन का रास्ता तो महज़ आधे घंटे का ही था पर दूर्गा पूजा को लेकर जाम से बचने के लिए वो बिना कुछ खाए ही अपने रूम में ताला लगाकर निकल पड़ता है। बाहर निकलने पर उसका अंदाजा सही होता है, चारों ओर लोगों का जमावड़ा लग चुका था। हल्की बुंदे भी बादल से बरस कर शहर के खुशी में शामिल हो रही थी। पुरा शहर मानों शामियाने सा सजा हुआ था, पर उसे अभी लालच कोलकाता की सजावट देखने का था। उसने हाथ देकर टेम्पो रोका और चल पड़ा स्टेशन की ओर। जाम से किसी तरह बचते बचाते स्टेशन पहुंचता है। इतने में बुंदे तेज़ बारिश का शक्ल ले चुकी थी, और स्टेशन में पैर रखने भर की भी जगह नही थी। प्लेटफार्म पर पहुंच कर वो अपने गीले बालों को पोंछ कर ट्रेन का इंतजार करने लगा जिसे आने में अभी थोड़ा वक्त था। इतने में वो कुछ खाने का समान, अखबार और एक कप चाय लेकर कोने में बारिश से बचते चाय पीने लगता है। ट्रेन अपने पलेटफार्म पर आने वाली थी, वो कप डस्टबिन में फेंक, पैसे चुका कर ट्रेन के तरफ़ बढ़ता है। अपनी जगह खोज वो समान रख कर राहत की लम्बी सांस लेता है, आखिरकार वो कोलकाता में दूर्गा पूजा मनाने वाला था। वो अखबार उठाता तो है पढ़ने के लिए, पर थकान से उसे उबासी आने लगती है। सुबह का अलार्म लगा कर वो सुकून की नींद में डुब जाता है।
आंख खुलते ही वो घड़ी देखता है तो अलार्म बजने में अभी आधा घंटा बाकी था। वो मूंह-हाथ धोकर एक कप चाय लेकर खिड़की के बाहर देखता है और मौसम खुला पा कर खुशी से मन ही मन हंसता है। यूं तो वो पहले भी काम से कोलकाता आ चुका था पर दूर्गा पूजा के मौके पर उसका आना यह पहली बार था। स्टेशन से पहले ही उसकी सांसों में त्योहार का रंग उसे घुलता महसूस हो रहा था। स्टेशन पर जितने लोग थे वो सारे इस शहर में दूर्गा पूजा मनाने के लिए आने वाले ही थे। और इस वक्त ये शहर छोड़ कोई जाएगा भी क्यों? स्टेशन से बाहर कदम रखते ही वो एक जगह खड़े हो कर चारों ओर देखता है और जितना उसकी आंखों में समा सकता था वो भर कर इस खुशी के शहर में डुब जाता है। किसी ने सही ही कहा है,"जो कोलकाता आता है वो वहीं का हो जाता है।" वो काली-पिली कोलकाता की मशहूर टैक्सी में बैठ कर अपने होटल पहुंचता है और नहा कर सीधे चल पड़ता है नियू मार्केट की ओर। वहां सबसे पहले वो पेट भर नाश्ता कर अपनी भूख मिटाटा है, जो वो आने की जोश में भूल ही बैठा था। सारा शहर पंडालों से घिरा था, हर रास्ते सजे हुए थे। लोग इस त्योहार के रंग में सराबोर थे। सबके चहरे खुशनुमा और पूजा के खरीदारी में उलझे नज़र आ रहे थे। पंडाल की कारीगरी यकिनन इस शहर की सजावट में चार चांद लगा रही थी। पंडाल का ढांचा ऐसी बारिकी से उतारा गया था कि पंडाल और असली मंदिरों में फर्क मालूम कर पाना बेहद मुश्किल था। कोई पंडाल किसी से कम नहीं था।
होटल लौट कर वो नया सिलवाया कुर्ता और पाजामा पहन निकलता है शाम में चकाचौंध हुए शहर को निहारने। शाम में शहर की रंगत जल रही लाइटों से मानों दिन की तरह रौशन और जगमगा रही थी। अलग-अलग तरह की सजावट गलियों की रौनक बढ़ा रहे थे। पुरे शहर का नज़ारा देखने लायक़ था। वो जैसे-जैसे आगे बढ़ता है वो हैरान होकर कभी इधर कभी उधर नजरें फेरते इस माहौल में खोता जाता है। जब उसकी नज़र आगे पड़ती है
तो उसकी आंखें फटी रह जाती है। आसमान को छूता आलिशान महल जैसा पंडाल उसकी आंखों के सामने था। वो उसकी तरफ खिंचा चला जाता है। उसने ऐसा पंडाल कभी नहीं देखा था, पंडाल के बिच में मां दूर्गा शेर पर बैठ महिषासुर का वध कर रहीं थीं। लोग बारी-बारी उनकी आरती उतार रहे थे। वो ये सब देखकर पंडाल के बाहर आता है। उसे सिगरेट की तलब उठती है। वो भीड़ से हटकर कोई किनारे में दुकान खोजता है। थोड़ी देर चलने के बाद उसे एक दुकान दिखती है जो हुगली नदी के किनारे थी। वहां जाकर वो सिगरेट जला कर इस सारे नशे को खुद में समाने लगता है। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ती है जो वहीं किनारे अकेले खड़ी थी। उसने मामूली से कपड़े पहन रखे थे, जुड़े में बांधे बाल, माथे पर शिकंजों के बीच छोटी सी लाल बिंदी जो इस पुरे कोलकाता की सजावट को भी फिका कर रही थी। होंठों पर लाली और नजरें बेचैन किसी को ढूंढ रही थी। उसे देख वो उसकी तरफ अपने आप बढ़ने लगता है। उसके कदम उसके काबू में नही थे, जब वो उस लड़की के नजदीक पहुंचता है तो वो मुड़कर सीधे उसकी आंखों में झांकती है, जैसे उसी का इंतजार कर रही हो। वो खुद को रोक नहीं पाता है और वो इस रौशन शहर को छोड़ अंधेरे के तरफ़ उसके पिछे मानो चुम्बक की तरह खींचता चला जाता है।
नदी के किनारे वो कोने में बेंच पर बैठ जाती है। वो उससे उसका नाम पुछने की कोशिश करता है की अचानक वो उसका हाथ पकड़ लेती है। उसकी कुछ अजीब सा लगता है और वो हाथ छुड़ाने लगता है पर नाकाम रहता है। उसके आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है और वो वहीं गिर पड़ता है। सुबह जब उसकी आंखें खुलती हैं तो वो खुद को उसी बेंच पर लेटा पाता है जहां रात वो लड़की बैठी थी। उसके सर में जोरों का दर्द उमड़ता है, जैसे किसी ने सर पर लाठी दे मारी हो। वो खुद को सम्हालते हुए बैठता है और नदी से पानी लेकर अपने मुंह पर मारता है। जब होश अच्छे से आता है तो हड़बड़ी में अपनी जेब में बटुआ और हाथ की घड़ी खोजता है। सब कुछ सही सलामत था पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसके सर में तेज़ चुभन सी महसूस हो रही थी। उसने याद करना चाहा पर उसके पास बस कुछ धुंधली यादें ही सामने आईं, उस लड़की की लाल बिंदी और हल्की झलक जिसमें वो किसी के पिछे भाग रहा था। ये यादें उसके लिए अजीब थी, क्योंकि वो तो कहीं गया ही नहीं था। वो इसे ख्वाब समझ कर मार्केट की तरफ़ बढ़कर एक कड़क चाय पीता है और होटल के लिए टैक्सी लेता है। होटल पहूंचते ही नहा कर सो जाता है। उसकी आंखें खुलती हैं और वो जब वक्त देखता है तो उसके होश उड़ जाते हैं। वो चौबीस घंटे से गहरी नींद में सो रहा था, उठ कर जब आईने में खुद को देखता है तो सहम जाता है। उसके हाथ खुन से सने हुए थे, और कपड़े मैले हो रखे थे। उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था, बस पिछले दिन की तरह तेज़ चुभन और धुंधली यादें। इस बार वो गोयते से किसी का गला काट रहा था। वो घबरा जाता है, उसके हिसाब से उसने इस कमरे से बाहर कदम भी नहीं रखा था। वो बाथरूम जाकर जल्दी नहाता है और खुन को साफ कर कपड़ों को सुखने डाल देता। नहा कर बाहर आने के बाद उसका पूरा बदन कांप रहा था। नहाने के बाद भी वो पसीने से तर था, जब वो हाथ से पसीने को पोंछने उठा कर अपने सर तक ले जाता है तो पाता है उसका सर आग की तरह जल रहा था। उसे शक होता है की हो ना हो यह जरुर उसी लड़की का काम है। वो गुस्से से बावला हो उठता है और ठानता है कि आज वो उसे ढूंढ कर ही दम लेगा। वो होटल से निकलता है, साथ में उसे जोरों की भूख भी लग रही थी। नाश्ते में लगभग बीस रोटी खाने के बाद भी उसकी भूख खत्म नहीं होती है। वो ऐसे खाने पर टूट पड़ता है जैसे कभी सदियों से खाना नसीब नहीं हुआ हो, वो पानी मंगाता है और दो जग पानी गटक जाता है। खाने के पैसे देकर आगे बढ़ता वहीं नदी किनारे उस बेंच पर उसका इंतज़ार करने। आज नवमी के वजह से भीड़ अभी दोपहर से ही सड़कों पर उतर आई थी। वो जिस चाह से कोलकाता आया था, इस हादसे ने उसके लिए मज़ा बिगाड़ दिया था। वो खुद को उस लड़की के पीछे जाने के लिए कोसता है। वो दूर्गा पूजा में शामिल होकर भी घूम नहीं पा रहा था। वो सोचता है चलो जो होना था हो गया, अब यहां बैठ कर उसका इंतज़ार करना वक्त की बरबादी है। यह सोच कर वो उठना तो चाह रहा था पर उसके पैर बंधे मालूम हो रहे थे। वो पुरी शिद्दत से ताकत लगाता है पर खुद को हिला भी नहीं पाता है। धिरे-धिरे उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है। उसकी आंखें फिर खूली तो सिधे अगले दिन विजय दशमी के रोज़। वो खुद को सम्हालते हुए खड़ा होता है और नदी के तरफ़ बढ़ता है। जब वो नदी में अपनी झलक देखता है तो उसके होश उड़ जाते हैं। उसके पुरे चहरे पर सिंदूर लगा था और उसकी आंखें खून से लाल हो रहे थे। वो अपना चहरा धोता है और चिल्लाता है, "मैं कया कोलकाता सोने आया हूं? मैं उस लड़की को छोड़ने नही वाला।"
यह बोल कर जब पिछे आता है तो बेंच पर वहीं उसे वो लड़की दिखाई देती है। गुस्से में वो उसकी तरफ दौड़ता है और उसके उपर सवाल लेकर टूट पड़ता है, पर वो गुम वहीं बैठी रहती है बिना कुछ बोले। वो उसपर हाथ उठाने वाला होता है, पर लड़की पर उसे हाथ उठाना सही नहीं लगता। उसकी नज़र फिर उसकी लाल बिंदी पर जाती है, "ये बिंदी मुझे मार कर ही मानेगी।" वह मन में सोचता है और उसके पैरों को पास बैठ जाता है और गिड़गिड़ाते हुए पुछता है, "मैंने क्या बिगाड़ा है आपका? मेरे साथ ये क्या हो रहा?" वो उसकी तरफ देखती है और उसे उठा कर उसे अपने बगल बैठाती है और सारी बातें उसे बताने लगती है। उसकी बातें सुनकर उसके आंख नम हो जाते हैं, उसे उस लड़की की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था। वो डर जाता है की उसने ये क्या कर दिया। पर वो उसके सर पर हाथ फेरती है और अपनी आंखें बन्द कर कुछ मन में पढ़ती है। जैसे ही वो अपना हाथ हटाटी है उसे बेहद हल्का महसूस होने लगता है। वो लड़की उसे सारी बातें बता कर जाने लगती है, वो उससे नाम पुछता है और वो जवाब देती है, "देवशी"। वो आगे बढ़कर धीरे-धीरे भीड़ का हिस्सा बन जाती है।
उसके मन में बहुत से सवाल थे, पर वो बेहद सुकून महसूस कर रहा था। वो वहां से उठकर आगे बढ़ता है महल जैसे पंडाल के तरफ़ और जाकर मां दूर्गा की आरती उतारता है। नीचे दूर्गा जी के सारे रुपों के नाम लिखे थे जिसमें एक "देवशी" भी था, वो नाम पढ़कर मुस्कराता है। ये दूर्गा पूजा वो कभी नहीं भूलने वाला था। उसे यहां रुक कर सच की गहराई तक जाना था पर टिकट भी बूक था। वो होटल पहुंच कर अपना समान लेकर स्टेशन पहुंचा, और ट्रेन पकड़ चल पड़ता है अपने शहर की ओर।
कुछ हफ्तों बाद सब कुछ आम दिनों जैसा हो चुका था। वो रोज आफिस जाता और अपना काम करता, पर कहीं न कहीं सवाल उसे बेचैन करते। उसे कभी उस लड़की की बातें कहानी लगती तो कभी सच। एक दिन आफिस में अपनी कुर्सी पर बैठ कर लगे टीवी में न्यूज चैनल बदल रहा था। इतने में उसकी नज़र पड़ती है नीचे चल रही हेडलाइन पर। "कोलकाता में एक बड़ा खुलासा, लाश का हुआ पर्दाफाश!" और साथ में जो तस्वीर थी, उसे देख उसकी आंखे फटी की फटी रह गईं। न्यूज़ से उसे मालूम होता है की जो लड़की उसे दिखाई दी थी वो दूर्गा पूजा के पहले दिन लापाता हो गई थी जिसके साथ अगुवा करने वालो ने तीन दिन तक लगातार बलात्कार कर ज़िंदा लाश नाले मे फेक दिया था, उसके साथ उसकी छोटी बहन भी मौजूद थी जिसकी मौत अगुवा करने वक्त झड़प में गाड़ी से गिरने की वजह से हो जाती है। साथ में तीन लाशें और बरामद हुई, जो उन लोगों की मानी जा रही थी जिन लोगों के उपर लड़की को अगुवा और बलात्कार करने का मामला दर्ज कराया गया था। ये तिनों कत्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन अंजाम दिए गए थे। कत्ल किसने किया इसका कोई भी सुराग पुलिस के हांथ नहीं लगा था, पुलिस छान बीन तो कर रही थी पर अभी तक नाकाम थी। न्यूज़ से उसे पता चलता है की वो लड़की सच बोल रही थी, उसने राहत की एक लम्बी सांस ली," आखिर दूर्गा ने महिषासुर का वध कर ही दिया। वो यादें सिर्फ यादें नहीं हक़ीक़त थी, जिसका अहम हिस्सा वो खुद था।
वो उठ कर आफिस के बाहर सिगरेट पीने जाता है और जैसे सिगरेट जलाता है तभी उसके फ़ोन की घंटी बजी और मैसेज आता है, "अभी कुछ काम बाकी है। कोलकाता कब आना है?", देवशी। मैसेज पढ़कर वो खुश हो उठता है और एक लम्बी कश खींच आधी जली सिगरेट बुझाकर चल पड़ता है, बाकी काम को पूरा करने।
By Syed Aamir Razaa

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