बारिशें
By Bansari Pritesh
लम्हा-लम्हा बेचैनी कैसे समझाऊं तुम्हें,
तुम्हें किस्तों में खोने का दर्द कैसे बताऊं मैं?
घड़ी चलने पर जान निकलती है—आहिस्ता से, कैसे कहूं...
तुम्हारे होते हुए भी तुम्हारी कमी है, क्या करूं?
क्या करूं कि तुम्हें देखते हुए भी नज़रें तरसती हैं,
इक लफ़्ज़ न निकले—इतनी जज़्बातों की बारिशें बरसती है।
क़तरा-क़तरा बिखर जाता है हर बार मेरा,
जब-जब ये घड़ी चलती है।
By Bansari Pritesh

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