बारिश का रोमांच
By Mahaveer Singh Tanwar
आज बरसात का ऐसा अद्भुत आलम था यारों
सुनो सूरज सुनो चंदा, सुनो तुम नभ के सब तारों
घिरे बादल थे चारों ओर, लहर इक ठंडी सी आई
मेरे कमरे की खिड़की से, आकर मुझसे बतियाई 1.
छुअन उसकी मेरे तन को, झंकृत यूं कर डालेगी
न सोचा था मेरे मन को, रोमांचित कर डालेगी
तपन दिन की हुई गायब, लहर शीतल के जादू से
और एक पल में बाहर था, मेरा मन मेरे काबू से 2.
शुरू बारिश का होना था, हरा हर मन का कोना था
उछलते बच्चों को देखा, मुझे बचपन में खोना था
याद वो सारे दिन आए, भिगोया बूंदों ने जब जब
झूमकर नहाते थे हम सब, खुशनुमा जीवन था तब तब 3.
खुशी की चीख बच्चों की, मुझे वर्तमान में लाई
सामने नाचतीं बूंदें, मुझे मजबूर कर पाईं
हुआ तैयार मैं भी तब, खोलकर अपने कपड़ों को
नहाया भूलकर सारे, व्यस्त जीवन के लफड़ों को 4.
दूर अंबर से गिर गिर कर, भिगोती बूंदें तन मन को
फुहारें वायु से मिलकर, दिखातीं अपने नर्तन को
अगर देखें सोच कर तो, नहीं था अंतर भी कोई
बच्चों के बचपन के संग में, बारिशी रंग घुला कोई 5.
ताजगी तन मन की उस पल, देखने के ही काबिल थी
झूमकर बादल थे बरसे, खुशी उस पल की वाजिब थी
भीना भीना सा एहसास, कहां ऐसा मिल पाता है
खुले आकाश के नीचे, अमृत सा मिल जाता है 6.
आज बरसात का ऐसा, अद्भुत आलम था यारों
सुनो सूरज सुनो चंदा, सुनो हे! नभ के सब तारों
मची थी धूम सी दिल में, खिलखिलाया सा जीवन था
चिलचिलाती सी धूप में, हरा सा जैसे यह वन था 7.
By Mahaveer Singh Tanwar

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