बारिश
By Pragati ishwarchand sahuji
बारिश की बुंदे बढी तेज आवाज कर रही थी
आसमां से नीचे आने की खुशी मे शायद वो गा रही थी
बेसब्रीसे था उन्हे धरती से मिलने का इंतजार
पर बादलो मे कई दिनोसे ऐसी बात नही थी
बारिश की एक बूंद मुझसे बोली
आजा बाहर हम संग खेल ले होली
लगने दे दाग भीगने दे चोली
बस होजा तू मस्त मगन और होजा गीली
मत बना तू अपनी शक्ल भोली
देख मेरे आनेसे कली है खिली
इस डाली से उस डाली तितली है चली
शाम भी मेरे आनेसे जल्दी है ढली
मै तो हु एक बूंद, जो हर जगह खेली
महिनों से चुपी बादलो से मै निकली
कभी बादल पर तो कभी पेड़ो पर मै झुली
कभी अकेली तो कभी होती है सबके साथ रैली
सुन लो कभी मेरी भी खामोशी
मेरे आनेसे होती है किसान को खुशी
और पौदो मे होती है बेहोशी
उन्हे भिगो कर करती हु मै बदमाशी
सुन लो कभी मेरी भी खामोशी
मै हु दूर आस्माँ मे पर धरतीसे जुड़ी
मोहब्बत वालों के तो दिल से जुड़ी
बिन मौसम मे कही ना मुड़ी
मिलेंगे फिरसे मै स्वागतमे हु खडी
By Pragati ishwarchand sahuji

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