बस तुम
By Nidhi Parikh
बंद दराज़ों में
खुली किताबों में
चाय के उस खाली गिलास में
भरी हुई आँखों में
भीड़ के शोर में
रात की खामोशी में
बेवजह के ख़्यालों में
समझदारी की बातों में
बेपरवाह उड़ते बालों में
दिल के संभलते इशारों में
बिखरी नींद में
समेटी हुई सिलवट में
तुम हो
हर बात में, हर साँस में
मेरी हँसी में, मेरे जज़्बात में
मैं जो देखती हूँ
उस नज़र में
और जो महसूस करती हूँ
हर उस
एहसास में
मेरे नाम में, मेरे काम में
हर रंग में, कोरे मन में
मेरे गुज़रे हर पल में
मेरे आने वाले कल में
तुम मेरे साथ हो
ढूँढती हूँ तुम्हें हर चेहरे में
आइने के उस तरफ़
तो कभी इस
जकड़ी हुई हूँ पहरों में
तोड़ के भी होगा क्या
अंदर तुम
बाहर भी तुम
तुम, मैं.
मैं, तुम.
बस तुम.
ना चाहत कोई
ना इच्छा बाक़ी
दिल भरा हुआ है
पूरी तरह से कुछ यूँ
की मार के ताला, फेंक दी है चाबी कहीं
ढूँढने पर भी मिलेगी नहीं
ढूँढना है ही नहीं
और जो लगनी ही है अगर कभी हाथ किसी के
तो वो हाथ हो तुम्हारा
साथ लिखा है किसी का अगर
तो हो वो बस तुम्हारा
बंद दराज़ों में
खुली किताबों में
चाय के उस खाली गिलास में
भरी हुई आँखों में
भीड़ के शोर में
रात की खामोशी में
बेवजह के ख़्यालों में
समझदारी की बातों में
बेपरवाह उड़ते बालों में
दिल के संभलते इशारों में
बिखरी नींद में
समेटी हुई सिलवट में
तुम हो
हर बात में, हर साँस में
मेरी हँसी में, मेरे जज़्बात में
मैं जो देखती हूँ
उस नज़र में
और जो महसूस करती हूँ
हर उस
एहसास में
मेरे नाम में, मेरे काम में
हर रंग में, कोरे मन में
मेरे गुज़रे हर पल में
मेरे आने वाले कल में
तुम मेरे साथ हो
ढूँढती हूँ तुम्हें हर चेहरे में
आइने के उस तरफ़
तो कभी इस
जकड़ी हुई हूँ पहरों में
तोड़ के भी होगा क्या
अंदर तुम
बाहर भी तुम
तुम, मैं.
मैं, तुम.
बस तुम.
ना चाहत कोई
ना इच्छा बाक़ी
दिल भरा हुआ है
पूरी तरह से कुछ यूँ
की मार के ताला, फेंक दी है चाबी कहीं
ढूँढने पर भी मिलेगी नहीं
ढूँढना है ही नहीं
और जो लगनी ही है अगर कभी हाथ किसी के
तो वो हाथ हो तुम्हारा
साथ लिखा है किसी का अगर
तो हो वो बस तुम्हारा
By Nidhi Parikh

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