बरसाती मौसम
By Sanket S. Tripathi
बरसाती मौसम सफर में था मैं ,
परबत बारिश हरियाली में था मैं,
पहाड़ों में बहता वो झरनो सा था मैं,
सवालों जवाबों ख़यालों में था मैं |
ख़याल वही
के हमसफ़र होके भी अकेले हो कैसे ?
समंदर है साथ फिर भी प्यासा हो जैसे|
नए रिश्तों में भी पुरानी पकड़ है
मोहब्बत है ज़्यादा या ज़्यादा अकड़ है |
सवारूँ मैं तुझको , सँभालूँ या खुद को ,
बिगड़ी है तू या सुधारूँ मैं खुद को |
खुद ही पे था गुस्सा और नाराज़ था मैं,
सवालों जवाबों ख़यालों में था मैं |
तभी एक बदाल उतर आया ऐसे ,
बाँहों में धरा को लपेटे हो जैसे |
दुल्हन के नयन की सी रंगत थी उसकी,
बरसे नीर जैसे , जुदाई की सिसकी |
वो बूंदे गिरता , लोगों को भिगाता ,
वो सावन की बूंदो से शोर मचाता |
तड़प देख उसकी परेशान था मैं ,
सवालों जवाबों ख़यालों में था मैं |
बदल के लिए जो पानी जुदाई का ग़म था,
पूछों ज़मी से, क्या अमृत से काम था!
चारों तरफ क्या ये हरियाली आती,
जो बारिश की बूंदो से न बीज नहाती ?
बदरी के रोने से खुशहाली आती ,
खिड़की के अंदर से , बिटिया मुस्कुराती |
त्याग देख बदरी की हैरान था मैं,
सवालों जवाबों ख़यालों में था मैं !
By Sanket S. Tripathi

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