बयां- ए - दर्द
By KAUSTUBH MISHRA
क़तरे-क़तरे को तरसते रहे उम्र भर,
और मयकशी में हम बदनाम हो गए।
जिस महफ़िल के थे मेज़बां हम कभी,
आज उसके ही हम मेहमां हो गए।।
थी जन्नत की आरज़ू मुझे भी मगर,
देखो दोज़ख का मुझको है तोहफा मिला।
सींचा था लहू से वफ़ा के चमन को
देखो फूलों की लाशों पे कांटा खिला।।
दिल के छालों को कोई छुए तो कभी,
ज़ख्म गहरे हैं कितने दिखा देंगे हम।
दूर से ही सही देके आवाज़ देखो,
दर्द कितना है ये भी बता देंगे हम।।
तोहमत है कि हमने किए हैं सितम,
और अश्कों में उनको डुबोते रहे।
उन्होंने कभी भी ये जाना तो होता,
कि छुप छुप के हम भी तो रोते रहे।।
सुर्ख़ जोड़े का जीवन मुबारक उन्हें,
अपनी क़िस्मत से आख़िर मैं कब तक लड़ूं।
अपने अश्कों की देना बिदाई मुझे,
ओढ़ चादर कफ़न की जो कांधे चढ़ूं।।
By KAUSTUBH MISHRA

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