बढ़ते बढ़ते
By Pratibha
बढ़ते बढ़ते कितना कुछ छोड़ जाना पड़ता हैं,
नन्ही नन्ही आंखों में बड़ा सा सपना पलता है,
बढ़ते हुए जो सपना एक ऐनक से टकराता है
जो सोते थे हलाहल के शोर में कभी ,
अब हवा की सरसराहट से उठ जाना पड़ता है,
पता नहीं कब हँसा था मैं जोर से , मुस्कराकर काम चलाना पड़ता है ,
कोई पिक्चर देखनी जरूर थी ,
सुना है उस नुक्कड़ की चाट बहुत मशहूर थी,
रात दिन का पता नहीं बस कुछ पन्नों से उलझना होता है,
लेट होते हुए अपने पसंदीदा पकवानों को ,
कभी हमेशा होंठों पर नाचने वाले उन गानों को
उस छुपी हुई थकावट में समेटना होता है ,
घर चलता है उन पत्तों से जो पसीने से मैंने सींचे थे
पकड़ना उन दर्द भरे हाथों को भी है जिसने पहिए घर के खींचे थे,
उन बूढ़े हाथों में अब एक छोटा सा हाथ है,
वो भी बुन सके एक सपना,
सब कुछ भूल जाना पड़ता है,
न जाने कब उमर निकल गई ,कितना कुछ करना था,
बस वक्त का छोर ओढ़ जाना पड़ता है,
बढ़ते बढ़ते कितना कुछ छोड़ जाना पड़ता है।
By Pratibha

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