बड़े शहर की तमन्ना
By Asheshwar Saw
बहुत दिनों से तमन्ना थी बड़े शहर में जाने की। ऊंची महल और इमारतें और बड़े-बड़े आईनो कि। पहुंच कर देखा ना सूरत थी ना शोहरत थी, बस घड़ी की सुई की टिक टिक सी जिंदगानी थी। बहुत दिनों से तमन्ना थी बड़े शहर में जाने की ।
इंसान का पैमाना सिर्फ झूठी पर पैसे बनाने की मशीन थी । बढ़ बोलो की बस्ती स्वार्थ की मोटी चादर ओढ़े झूठी हंसी थी । खुद जीने के लिए जीतने के लिए दूसरों को गलत साबित करने की हर ओर जुगाड़ थी ।बहुत दिनों से तमन्ना थी बड़े शहर में जाने की ।
चमकते वस्त्र आभूषण और पैरों में महंगे जूते , नजरों के सामने दिखावे की होड, कंक्रीट का जंगल हर और पत्थर दिल लिए इंसानी रूप में जरूरत लिए चारों और रोबोट की झुंड थी । बहुत दिनों से तमन्ना थी बड़े शहर में जाने कि ।
बिना किसी की परवाह किए चलने वालों की कमी न थी, यह अच्छा ही है दोस्तों। पर जीवन के मूल्यों का आंकलन की फुर्सत ना मिलना सच नहीं हो सकता। रुक कर सोचना और कर्तव्यों का आभास करना भी तो क्षणभंगुर संसार में अहमियत रखती है ।बहुत दिनों से तमन्ना थी बड़े शहर में जाने की ।
By Asheshwar Saw

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