बचपन क्या होता है
By Mrinalini Gajbe
बचपन क्या होता है..!
दो महिने का हूं,
नंगे बदन धरती के आंचल में लोड़ता हूं
मां काम पर गई है तो बहन की गोदी में फिरता हूं...,
बहना भी नादन, मुझे ज़मीं पर डाल,आस लगाये बैठी पास।
कहती मुसफिरों से भैया, दे दो हम रुपये चार।
बचपन क्या होता है!
मां मुझे कभी अपने आंचल में बाँध
करती मज़दूरी रोज अपार।,
में उसके वक्ष से चिपका
सो जाऊं भरी दोपहर!
बचपन क्या होता है।
खिलोने मेरे ईंट और पत्थर
बनाता उनसे अपने सपनो का घर
भूख प्यास गर लग जाए तो
खाने मिले गलियों की बौछार!
बचपन क्या होता है।
बाप की मार से सुबह आँख खुलती है
माँ की मजबूरी से ही प्यार की भरपाई होती है
नंगे पाओं निकल पडूँ काम की तलाश में दिन भर
कभी स्टेशन, कभी होटल, कभी मिलूंगा मैं सिग्नल पर
दौड़ती गाड़ियां,दौड़ती रफ़्तार, दौड़ते वक़्त के बीच
पड़ती किसी की न नज़र!
बचपन क्या होता है।
गाली सुन कर, मार खा कर,
निष्ठुर मैं बन गया हूँ
घर छोड़ कर भाग आया हूँ
दो दिहाड़ी कमा लेता हूँ,
दोस्त भी बहुत बन गए हैं मेरे
सड़क किनारे हैं मेरे रैन बसेरे!
बचपन क्या होता है।
आते जाते अमीरों के बच्चों को देखता हूँ
कभी कभार माँ को याद कर लेता हूँ
इससे पहले के आंसू आँखों मैं उतर आये
इसी धरती की गोद मैं सो जाता हूँ!
बचपन क्या होता है।
By Mrinalini Gajb

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